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Archive for दिसम्बर, 2009

A Nice story (from Sharad Kaka)

परख
एक पुरानी कहानी है। शायद आपने ना सुनी हो। अगर सुनी हो तो भी यकीन दिलाता हूं फिर से एक बार पढ़ी जा सकती है।
एक राजा हुआ करता था जिसका नियम था कि उसके शहर के हाट-बाजार में जो भी सामान नहीं बिकता, उसे वह खरीद लेता। उसी के राज्य में एक गरीब अंधा युवक भी रहता था। माता-पिता नहीं थे और वह अपने दो भाइयों पर आश्रित था। गरीबी से तंग आकर उसने अपने भाइयों से कहा – मैं अपना जीवन आप पर भार बनते नहीं देख सकता। आप मुझे बाजार में बेच दो।
भाइयों ने पहले तो इनकार किया पर जैसाकि होता है अंत में गरीबी ने उन्हें व्यावहारिक निर्णय लेने को बाध्य कर ही दिया। दोनों भाई उसे लेकर बाजार पहुंचे, लेकिन नेत्रहीन को कोई पारखी ग्राहक न मिला। अंत में राज कर्मचारी आए और उसे भी अन्य सामान के साथ लेकर राजा के पास पहुंचे। राजा को विभिन्न वस्तुओं के बीच एक अंधे आदमी को देख भारी आश्चर्य हुआ। वो बोला – अरे सूरदास, तुम मेरे पास तो आए लेकिन तुम मेरे किस काम आओगे? नेत्रहीन ने जवाब दिया – महाराज मैं अंधा हूं लेकिन मैं पारखी हूं। आपने दया कर मुझे आश्रय दिया है, आपको जब कभी कुछ परखना हो मुझे याद कीजिएगा। मैं अपनी उपयोगिता बता दूंगा। राजा हँसकर आगे बढ़ गया और बात आयी गई हो गई। एक दिन दरबार में ईरान से एक घोड़ों का सौदागर आया। वह दो सौ उम्दा अरबी घोड़े बेचने के लिए लाया था। घोड़े लड़ाई के लिए तैयार किए गए थे और खासियत यह थी कि पानी में वो दौड़ते निकल जाते। घोड़े देखने के लिए लोगों का हुजूम खड़ा था। राजा को अंधे की याद आयी, सोचा अंधे की परख जांची जाए। अंधे को दरबार में बुलाया गया। राजा ने कहा- सूरदास, सौदागर कहता है ये घोड़े पानी में कभी बैठते नहीं, क्या तुम इनकी परख सकते हो। अंधे ने हामी भरी और जाकर घोड़ों को सूंघने लगा। अंधा हर घोड़े के पास जाकर उसके मुंह के पास सूंघता और आगे बढ़ जाता। एक घोड़े पास जाकर वह रूका और चिल्लाया – महाराज यह घोड़ा पानी में बैठेगा। सौदागर हँसा, बोला – मेरे घोड़े तो राजा-सूरमा पहचान सकते हैं ये अंधा मेरे अरबी घोड़ों की क्या परख करेगा? अंधे ने कहा – ठीक है यदि यह घोड़ा पानी में बैठा तो सभी घोड़े महाराज के अस्तबल में बांधना हांेगे। सौदागर ने हामी भरी। परीक्षा के लिए घोड़ों को तालाब में छोड़ा गया। सब घोड़े पानी में दौड़ गए लेकिन अंधे का बताया घोड़ा पानी में बैठ गया। सब लोग ताली पीटने लगे। सौदागर माथा पकड़कर बैठ गया। राजा ने अंधे से पूछा – सूरदास, बताओ तुमने कैसे जाना कि वह घोड़ा पानी में बैठेगा? वह बोला – महाराज मैंने घोडों का जब मुंह सूंघा था तब मुझे उस घोड़े के मुंह से भैंस के दूध की गंध आई थी। मैं समझ गया दूध तो अपनी बात बोलेगा। राजा खुश हुआ और सौदागर बर्बाद। अंधा फिर अपनी कोठरी की राह चला गया।
कुछ दिन बीते परदेस से जवाहिरातों का एक सौदागर आया। वो बसरा से बेशकीमती मोती लाया था। राजदरबार में अपने खास मोती दिखाते हुए वह बोला – महाराज, आपने तो कई किस्म के मोती देखे होंगे लेकिन मेरे इन मोतियों को देखकर बताएं कि ऐसे बेजोड़ मोती का क्या कोई जवाब है? सब लोग मोती को देख कर तारीफ करने लगे। राजा को अंधे पारखी की याद आई। उसे बुलवाया गया। सौदागर अपने मोतियों पर कसीदे पढ़ रहा था। जब अंधे ने मोती हाथ में लिए तो जौहरी ने व्यंग से हँसते हुए कहा- अच्छी तरह से देखों भाई, मोती कैसे हैं? अंधे ने मोतियों को हाथ में लेते हुए कहा – महाराज जौहरी के कुछ मोती ठीक नहीं है। जौहरी को गुस्सा आ गया, लेकिन वह हँसते हुए बोला – महाराज हमने तो अपने जवाहिरातों की परख जौहरी के हाथों ही करवाई है। अंधे ने कहा- तो ठीक है, शहर के सबसे बड़े जौहरियों से परख करवाई जाए अगर मेरी बात सही निकली तो सारे मोती राजसात किए जाएंगे। जौहरी ने गर्व के साथ हामी भरी। शहर के बड़े जौहरियों को बुलवाया गया। अंधे ने अलग निकाले मोती जब उन्होंने जाँचे तो बेठीक पाया। सारे मोती राज खजाने में पहुंच गए। जौहरी अपना छोटा-सा मुंह लेकर चला गया। राजा ने अंधे की खूब तारीफ की और फिर पूछा – सूरदास, बताओ तुमने कैसे जाना की मोती अच्छे नहीं थे? अंधे ने जवाब दिया – महाराज, मैंने मोती के आकार और वजन को परखा। उनमें से कुछ मोती मुझे अपेक्षाकृत भारी लगे। मैं समझ गया कि भारी मोतियों के बनते वक्त भीतर रेत के ज्यादा कण भर गए होंगे, और मैंने उन्हें अलग कर दिया। राजा ने अंधे को फिर शाबासी दी और अंधा फिर अपनी कोठरी की ओर निकल गया।
कई दिन बीते। एक दिन राजा के मन में आया कि यह अंधा, जो पारखी है क्यों न मैं इससे अपनी परख करवाऊँ? राजा ने जब अंधे से कहा – सूरदास तुम मेरी परख कर बताओ। अंधा राजा के पाँव में पड़ गया। वह बोला – अन्नदाता दुहाई, आप मुझसे यह न करवाएं। राजा ने कहा – सूरदास, तुम्हें यह करना ही होगा। अंधा बोला- मुझे अपने प्राणों का भय है। राजा ने जोर दिया, कहा – नहीं तुम्हें मेरी परख करनी होगी। मैं तुम्हें अभय देता हूँ। तुम कहो – मैं कैसा हूँ?
अंधे ने हाथ जोड़कर कहा- महाराज, आप अच्छे हैं लेकिन आप राजपुत्र नहीं है, बनिए के लड़के हैं। राजा सुन्न रह गया। अंधे ने कहा – महाराज मैं इसीलिए आपसे मना करता था। राजा बोला – वह सब ठीक है। लेकिन मैं कैसे जानूं कि तुम जो कह रहे हो वह ठीक है? अंधा बोला- महाराज, आप राजमाता से पूछें, क्योंकि सत्य वहीं जानती हैं और बता सकती हैं।
राजा दौड़ता हुआ महल में राजमाता के पास पहुंचा। उसने पूछा – आप मुझे बताएं कि मैं किसका बेटा हूँ? राजमाता ने कहा- क्यों बेटा, यह कैसा  प्रश्न तुम स्वर्गीय महाराजजी के पुत्र हो। राजा ने जोर दिया – नहीं आज मुझे सच जानना है, आप मुझे सच बताएं नहीं तो आप मेरा मुंह न देखेंगी। राजमाता ने टालने की बहुत कोशिश की लेकिन राजा को मानते न देख, बोली – तुम सच सुनना ही चाहते हो तो सुना। तुम महाराज के नहीं, कोषाध्यक्ष के पुत्र हो। जब महाराज युद्ध में गए थे, ऋतुकाल के बाद मैं कामप्रेरित थी, तब कोषध्यक्ष से सहवास हुआ, और तुम्हारा जन्म हुआ। कुछ दिनों बाद ही राजा युद्ध जीत कर लौटे और किसी को कुछ पता न चला।
सत्य जानकर राजा हतप्रभ रह गया।
अंत में वह फिर अंधे के पास पहुंचा और बोला – सूरदास तुम्हारी बात सही निकली, पर एक बात बताओ। मेरा आखिरी  प्रश्न है – तुमने यह बात कैसे परखी?
अंधा हाथ जोड़ कर बोला – महाराज, आपने मुझे आश्रय दिया। आपने मुझे घोड़ों की परख के लिए बुलवाया और आपको दो सौ अरबी घोड़े प्राप्त हुए। कोई राजा होता तो खुश होकर मुझे जागीर दे देता। मैंने मोतियों की परख की और आपको मोतियों का खजाना मिला, कोई राजपुत्र होता तो मुझे गले का कंठा दे देता। आपने मेरी तारीफ कर भेज दिया। मैं समझ गया, यह बुद्धि किसी राजपुत्र को नहीं वणिक को ही सुलभ है. . .

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व्यक्ति और वैश्विकता: कुछ बिखरे सूत्र
भाग – 2
ये बिखरें सूत्र ही है

पहले कुछ इतिहास से
योरोपीय उपनिवेशवाद के पूर्व के परिदृश्य की कल्पना करें। (1) हर राज्य, मजहब, तहजीब के दायरे में बंधा था। कानून, नैतिकता और रिवाजों का पालन स्थानीय था और उनमें इससे पहले बड़े स्तर पर बदलाव खलीफाई उपनिवेशवाद के बाद से नहीं आए थे। योरोपीय उपनिवेशवाद ने सबको झझकोर कर रख दिया। राष्ट्र और जनतंत्र की विचारधारा के विकास ने अरब जमीन पर ही खलीफी साम्राज्य की असंगतता बना दिया था और दारुल हरब की अवधारणा भी तभी से अप्रासंगिक हो गई। यह एक क्षेत्रीय जनतांत्रिकरण का सफल उदाहरण था। (2)
ब्रिटिश उपनिवेश ने पूर्ववर्ती खलीफाई लहर को बिखेर दिया। असल में खलीफाई औपनिवेशिक विचार का आर्थिक दृष्टिकोण पुराना था। उसकी अपनी सीमाएं थी। वह मजहब के आधार पर भूभाग पर अपनी केंद्रीय सांस्कृतिक-मजहबी सत्ता और कुछ नजराने से संतुष्ट था। दीर्घकालिक आर्थिकतंत्र जिसमें उसका हित बना रहे, के विकास के लिए न उसके पास जरूरी समझ थी, न तकनीकी थी और ना ही तैयारी। उस युग में कला, साहित्य और सामाजिक जीवन में एक सरलता थी। सही-गलत, नैतिक-अनैतिक, पाप-पुण्य सबके संबंध में भले ही कुछ अनगढ़, भ्रामक, मिथकीय नियम थे। व्यक्ति की सोच, कामनाएं और कल्पनाएं भी स्थानीय थी। भले ही इस्लाम ने एक वैश्विकता का सपना देखा था और उस दिशा में कदम भी उठाए थे पर काहिरा, इस्तांबुल, कंधार, काठमांडू, दिल्ली, पुणो और मैसूर का रहवासी नागरिकता की जिम्मेदारी, भय-पुरस्कार आदि को अपने स्तर पर समझ कर जीवन बिताता था। जीवन के वैश्विक डायमेंशन से वह बड़े हद तक अप्रभावित था।
गुलामी का सुदीर्घ अनुभव प्राप्त भारत के लिहाज से ये परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था। मुगलों के आगमन से हजारों वर्ष पहले से ही यहां का वैविध्यपूर्ण जीवन और संपदा कम संपन्न कबीलाई समाज को आकषिर्त करते रहे थे। धार्मिक परंपराओं की सनातनी प्राचीनता और अनेक मतों से बनी उदात्तता ने चर्च स्टेट के ऐक्य की संभावना के लिए कोई स्थान नहीं रखा था जोकि समूचे मध्यकाल में सबसे महत्वपूर्ण गठजोड़ था। अगर इसे सामाजिक विकास का सोपान समझे तो आधुनिक राष्ट्र के लिए आवश्यक सामाजिक जुड़ाव और उससे उत्पन्न होने वाली शक्ति का अनुभव भारत के पास बिल्कुल नहीं है। शक्तिशाली मुगल साम्राज्य की जो स्मृति लोक इतिहास में पाई जाती है और ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह समझना मुश्किल नहीं कि एक विदेशी मजहब और शासन के अंतर्गत ऐसे भाव के विकास की संभावना कितनी रही होगी। भारत में इस्लामी शासकों के दौर को देखें और अनुभव करें कई मामलों में वह समय बड़ा अजीब लगता है। मसलन विदेशी शासक जो एक अजनबी महजब और उसके कानून को मानते हो, उनके अनजान विचार, अनजानी ताकत सबकुछ उस काल के मानस को कैसा लगा होगा? और यह सोचने में भी कितना भयावह लगता है कि भारतीय मानस ने किस प्रकार लगभग 1000 साल तक विदेशों से संबंध अपनी समझ या जरूरत नहीं बल्कि एक विदेश में आस्था रखने वाले अजनबियों के हित और समझ के आधार पर बनाए रखे थे। ऐसे मानस की पीड़ा मार्मिक है जो अन्य सभी उपनिवेशों पर भी समान रूप से लागू होती है।
अशोक के बाद शायद प्रथम बार ही धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर बिखरे एकात्मता के सूत्र ब्रिटिश उपनिवेशवाद के साथ आई आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा से परिवर्तित हो रहे थे। लेकिन इसके साथ ही एक ऐसा आधुनिकता का बोध भी उठ रहा था जो सारी परंपरा को नकारने के लिए तैयार था।
यह प्रयास अनूठा ही होना था। आधुनिक राष्ट्र की अवधारणा मजहब, नस्ल और सांस्कृतिक स्तर पर एक होमाजीनियस जनसंख्या का लोकतांत्रिक शासन की है। (3) इसमें मजहब की भूमिका व्यक्तिगत स्तर पर सीमित है और यह भाव इतना प्रबल है कि अधिकांश यूरोप और अमेरिका में चर्च की भूमिका स्थानीय स्तर पर घटती जा रही है। वहां का नागरिक तीसरी दुनिया के देशों में सेवा और मिशनरी गतिविधियों के लिए दान करता है और उसका कारण भी वैश्विकता से उपजी संवेदनशीलता, जिम्मेदारी, भय या शायद कुछ ग्लानि का बोध है। भारत जो हर लिहाज से किसी महाद्वीप से कम नहीं, में आधुनिकता के प्रभाव बड़े विचित्र थे।
आधुनिकता के पास औद्योगिक क्रांति से मिली तकनीकी बढ़त, चिकित्सा शास्त्र की सफलता, शिक्षा, स्वास्थ्य, अन्न और सैन्य बल में सफलता के प्रोपागांडा की विस्तृत और निरंतर विकसित होती मशनरी थी और इस मशनरी में बड़ी संख्या में स्थानीय उच्च वर्ग का हो रहा समावेश था। यह स्वयं में सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण था। ब्रिटेन के साथ एक उपनिवेश के रूप में संपर्क करने वाला भारत कई अर्थों में तत्कालीन विश्व का एक लघु रूप कहा जा सकता था। एक भूभाग जो हिमालय से हिंद महासागर तक एक अनकहे सांस्कृतिक एकता बंधा भौगोलिक बोध था और कुछ इस कदर बंटा हुआ भी कि लोगों के बीच परस्पर इतना विभेद दुनिया में अन्यत्र दुर्लभ ही था। प्रतिदिन देश के सुदूर प्रांतों में बहने वाली नदियों और पहाड़ों के नाम का पाठ करने वाले व्यक्ति जो शायद अपने कुनबे के बाहर के विश्व के प्रति अत्यंत सीमित जिम्मेदारी समझते थे। प्राचीनकाल से पीढ़ी दर पीढ़ी आ रही वैदिक परंपरा थी तो इसी सनातनता को शायद ही जाने, परंतु उसी के नाम से पुनव्र्याख्यायित करने वाले, उसे नवीनता से धारण करने वाले मत संप्रदाय थे। सामाजिक ढ़ांचे के नाम पर वर्ण व्यवस्था और सामंतवादी विचारों का मजबूत तंत्र था जो अर्थतंत्र से जुड़ा हुआ था और इसे तोड़ने के लिए अंग्रेजों को ऐडी-चोटी का जोर लगाना पड़ा था। तंत्र जो साथ ही इतना ढ़ीला और खंडित था कार्य-कारण के बीच की अवधि कुछ इतनी बड़ी थी कि आधुनिक कालबोध में इसे समझना नामुमकिन ही था।
हिस्ट्री के बोध की कमी के लिए भारतीय जाने जाते हैं। विराट भौगोलिकता और विविधता वाली पुरानी कौम की इस परेशानी को आधुनिक मानव नहीं समझता। वस्तुत: लंबे समय तक विदेशी दासता तो बाद का कारण है। प्रथमत: यह मानव की उस कमजोरी को इंगित करता है जो कि सभ्यता में एक विशिष्ट ज्ञान के प्रति समर्पण को बनाए रखने में निहित है। पुरानी दुनिया के पास विज्ञान आधारित कोई ऐसा तंत्र न था जो लौकिक ज्ञान को एक निरंतरता देता। धर्म, अध्यात्म, संस्कृति के जहां जो भी तंत्र थे उस मायने में अपर्याप्त थे। परिणामस्वरूप ज्ञान के संरक्षण में श्रुति-स्मृति का महत्व बढ़ता गया। ऐसे तंत्र के अभाव में श्रेष्ठ खोजे भी वैयक्तिक बन कर दफन हो गईं। उनका लौकिक जीवन से कोई संबंध न बन पाया कि मानों यह उनका हेतु ही न था। तकनीकी विकसित नहीं हुई जो कुछ हुई वह भी निरंतरता के अभाव में कहीं खो गई।
नैतिक रूप से देश एक अजीब विविधता भरे नैतिक विरोधाभास में जीता रहा। इसे हम पुरानी कौम के स्वभाव में देख सकते हैं। इसमें स्थानीय शायद व्यक्तिगत विचार समग्र हितों पर भारी थे। पुरानी कौम जो इतिहास को मिथकों के रूप में याद रखती है कुछ मिथकों से इतनी जुड़ गई कि वयक्तिक धर्म और आध्यात्मिक बोध फंतासी बनकर रह गया। उनका जीवन रस सूखता गया। इस कारण ऐतिहासिक या खगोलीय तथ्य कब मिथक बनकर चेतना का अंश बन जाते हैं और वर्तमान जिसमें धर्म अवस्थित रहता है से भी अधिक महत्वपूर्ण बन जाते है इसका भान भी नहीं होने पाता। नैतिकता की परिभाष एवं उसकी उपादेयता का जो प्रoA आज वैश्विक चिंतन के सामने है वह भारत में हमेशा से रहा है। बिरले लोगों ने उससे दो-दो हाथ किए है। और जिन लोगों ने ऐसा किया है उन्होंने इस महाद्वीपीय संस्कृति को दिशा दी है। ऐसे कई लोग चमक दमक भरी हिस्ट्री में खो जाते है या कि उन्हें पारंपरिक हिस्टोरिकल चरित्रों के परिप्रेक्ष्य में समझा जाता है क्योंकि हिस्ट्री का बोध समकालीन प्रभावों से अछूता नहीं रह सकता। प्रभावशाली, दबंगता के प्रभाव से आक्रांत किसी विषय से इससे अधिक की अपेक्षा की भी नहीं जा सकती। तो यदि कुछ लोग औरंगजेब को गैरमुस्लिम प्रजा के लिए ठीक या शिवाजी के महत्व को पतनशील मुगल साम्राज्य के परिप्रेक्ष्य में केंद्रित देखते है तो इसमे कुछ अस्वाभाविक नहीं। आधुनिकता राष्ट्र के लिए मूलभूत जरूरतें हमारे पास नहीं और जिस ज्ञान के आधार पर हमारा विकास हो जो उधार का नहीं हो, उसे हम मान्य नहीं करते। यही कारण है कि हर काल के चरित्र के कुछ अनुयायी हो जाते हैं स्याह घटनाओं में भी प्रकाश की किरणों के कल्पनाकार हो जाते है। इतिहास से वह मिथकीय चरित्र बन जाता है। उनका अध्ययन करने के लिए परंपरा से प्राप्त होने वाला कोई सर्वमान्य स्थान ही नहीं। फलस्वरूप असंख्य महापुरुषों की श्रंखला में एक और की वृद्धि हो जाती है। सत्य और नैतिकता के प्रति अनेकांतवादी दृष्टिकोण का इससे अधिक पोएटिक जस्टिस क्या हो सकता है?

उपनिवेश के रूप में जब आधुनिक शिक्षा का प्रचार आरंभ हुआ तो कई कारणों से भारतीय शिक्षा पद्धति को तोड़ने की जरूरत महसूस की गई। (4)
लेकिन भारतीय कोई सेमेटिक तहजीब की तरह फैथ के लोग नहीं थे। वे ग्रीक और ईरानी तहजीब के अधिक नजदीक थे। न्याय अंग्रेजी लॉजिक से साथ पढ़ाया जा सकता था। बाइबिल की कक्षा के मुकाबले सांख्य, मीमांसा या वैशेषिक दर्शन अधिक उपयोगी हो सकता था। वह एक अधिक उदात्त और वैज्ञानिक मानस का प्रेरक होता। लेकिन परंपरा में यह दोष बहुत पूर्व में ही प्रविष्ट रहा। वेदपाठी ब्राrाण जो अपना जीवन वेदों को कंठस्थ करने और फिर उसे याद रखने में लगाए रखें लेकिन उसके अर्थो के प्रति बिल्कुल अनजान हो तो वेदमूर्ति के रूप में वे वरेण्य तो होते हैं लेकिन महान अनुशासन, चरित्र और परंपरा के अधिकारी के रूप में विश्व के प्रति वृहत्तर उपादेयता व संभावनाओं के अनुपयोग में क्या वे जड़ नहीं दिखते?

मध्ययुग में मध्य एशिया और यूरोप में जो सामाजिक एवं राजनीतिक भूमिका चर्च की थी किसी अवैयक्तिक अर्थ में भारत में वही भूमिका वर्ण-जाति व्यवस्था की थी। यह राज्य को युद्ध के लिए सैनिक, धन-संपत्ति, हथियार आदि वर्ण-जाति व्यवस्था उपलब्ध करवाती थी। क्षत्रियों के लड़के युद्ध में सैनिक होते, वैश्य राज्य को धन अन्न आदि मुहैया करवाते। घुमंतु जातियां माल के परिवहन के साथ घोड़े, हाथी, ऊंट, हथियार आदि लाया करतीं। शूद्र वर्ण की जातियां पशु और सेना की सेवा से लेकर युद्ध में सहभाग तक की गतिविधियों में शामिल होती। वर्णगत कर्म की व्यवस्था से राज्य को ये सब चीजें सहज प्राप्त हो जाती। लेकिन इसके प्रभाव सांस्कृतिक दृष्टि से विनाशकारी थे। समाज के सामंतीकरण की प्रक्रिया न असाधारण गति पकड़ ली थी।

वर्ण व्यवस्था में बंटा भारतीय समाज एक मर्सिनरी समाज था जिसका कोई केंद्र ही न था। यह समाज व्यवस्था विविधता और एकात्मता की एक सीमित परिस्थिति में ही उपयोगी सिद्ध होती थी। इस कारण जब एक विदेशी सत्ता जो मजहब और तहजीबी तौर पर आक्रमक, असहिष्णु और संकीर्ण थी, उसमें वर्णगत कर्म ने व्यक्ति को नैतिक तौर पर सीनिकल बना दिया था। ऐसी परिस्थिति में स्थानीय का स्थानीय के विरुद्ध उपयोग अपरिहार्य था क्योंकि वह पहले से ही चला आ रहा था। लेकिन एक अन्य मजहबी परिवेश और नैतिकता के प्रभाव में वह अत्यंत अमानवीय हो चला था। ब्रिटिश काल में यह वर्ग ब्रिटिश को राजा मानकर अपने हितों को संरक्षित कर रखे थे। जब ब्रिटिश आधुनिकता ने उनके हितों पर कुठाराघात करना आरंभ किया और इंडोलॉजी के विकास के साथ जब लोगों को इतिहास की और गहरी समझ पकड़ में आने लगी तो सनातनी का हिंदूकरण आरंभ हो गया। १९ वीं शताब्दी का यह हिंदू एक काम्पलेक्स चरित्र था। वह शायद पहली बार वह वेदों को जान रहा था, अन्य संप्रदाय के हिंदुओं की परंपराओं और इतिहास में योगदान को किन्ही तत्कालीन बैकग्राउंड में पढ़ रहा था। एक ओर प्राचीन ज्ञान की थाती से परिचित हो रहा था लिबरल यूरोपीय विचारों व संगठित चर्च के मिशनरियों के बढ़ते प्रभाव से आक्रांत भी था। इस ट्रांसफार्मेशन में कई विचार धाराएं पनप रहीं थी। संप्रदायों में खालिस वेदमार्गी, भक्तिमार्गी, तांत्रिक के साथ असंख्य मनमुखी संकीर्ण मत उठ रहे थे। राजनीति और समाज में भी नीतियों के स्तर पर ऐसा ही वितंड मचा हुआ था। लेकिन इन सब के बीच में भी जो सबसे महत्वपूर्ण बात नहीं हो रही थी वह उस नैतिकता का आधार था जिसे सारा देश-समाज स्वीकार करता। लेकिन प्रभावशाली लोगों में तिलक, राजाजी, गांधी और मुसलमानों में आजाद के सिवा शायद ही किसी को इसके महत्व का इल्म था। नेहरू का नया भारत अंत में तत्कालीन फैशनेबल विचारों का पुलिंदा भर था। साम्यवादी प्रोपागांडा के शोर में, आधुनिकता संस्कृति रहित नहीं है यह शायद उनका इंप्रेशनेबल मस्तिष्क पकड़ नहीं पाया था।
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१. खरे अर्थो में ब्रिटिश उपनिवेशवाद ही आधुनिक युग की शुरुआत है। विश्व के अधिकतम लोगों ने एक दूसरे को स्थानीय दृष्टिकोण से हटकर इसी समय देखा था। इस नई दृष्टि की रोशनी मजहबी या तहजीबी न होकर विज्ञान आधारित थी। यहां तक कि मिशनरीयों को ब्रिटिश सरकार की सहायता भी उपनिवेश के राजनीतिक विज्ञान के निष्कर्षो पर आधारित आवश्यकताओं के मद्देनजर थी। चर्च के घोटने वाले अनुभव, रिनंेसा से मिले नव विचार, सामान्य बुद्धि और तर्क के युग का आगाज जैसे प्रभावों के आगोश में राष्ट्रीय हित और नीति का रुझान सहज ही प्रेगमेटिज्म की ओर था।
२. आज हम इस्लामी आतंकवाद की बात करते हैं उनके विध्वंसक गतिविधियों को भय मिश्रित आश्चर्य से तो देखते हैं लेकिन हम उसके पीछे की उस स्याह भवितव्यता को नहीं देखते जिससे शायद पॅन इस्लामी विचारवादी अच्छी तरह वाकिफ है – वह है इस्लामी विश्व की समग्रता का विखंडन। इस्लाम ने जिस सफलता से निरंतर युद्धरत जनजातियों की शक्ति को एक तंत्र में नियोजित कर उसे एक विस्तृत कैनवास पर बिखेरा था उस क्रम का अंत ही शायद एक अनोखे डेस्परेशन एक बेखुदी को जन्म दे रहा है। यह मानो एक अपूर्ण प्रोफेसी का अभिशाप ही है और सभी को अपने हिस्से का भाग भोगना होगा।
३. यूरोप ने लंबे समय तक इस विचार को अमान्य करता रहा है। लेकिन फ्रांस, नीदरलैंड, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों में इस स्वीकृत होमोजिनिटी की सीमा को मान्य न करने पर होने वाली परेशानियों पर देर सवेर ध्यान देना ही होगा।
४. मिशनरी स्कूल एवं विश्वविद्यालयों में जो वितंड मचा उससे उपजे विभ्रम की झलक पाने के लिए तत्कालीन कलकत्ते के लोकजीवन और साहित्य पर एक नजर डालना पर्याप्त है और अब तक शायद वहां भारतीय संवेदना के प्रति प्रेरक परिवेश नहीं बन पाया है।

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