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Archive for जनवरी, 2010

forlorn leaf – 4

Following a leaf in wind
Through gray gravel stretches
Misty showers crystallizing
In ravines and hills
On those smoldered greens
Feeling mystical dense mist
The prince touch the forlorn forts
Touching handsome Shepherds and sheep
Water gurgling, sadness standing
With their flocks
Their women spiffy
Delivering babies
On a wandering season song
The youth serene
Starry eyes
Behind their deep insinuating smile
Hiding the sorrow of rootless being
The gloom that bread the fear
Fear making them deadly reckless
‘Strange’ says the prince
How nature ensemble diverse
Seasons and the shepherds
Elements so alien s distinct; together
Next following a leaf flying
Prince enter in a star lit night
Whirled inside by a river
Lazy streams passing through amenable city
Abandoned by inhabitants
Coiled in depth, centuries
Stories of live deities and aerial golden snakes
Beneath the surface
Swim with the prince
Endless their path
Long their stay
Plugged by the primordial cord
Their immanent existentiality.

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forlorn leaf – 3

Returning back to his place
From a river side walk
The Prince sits on a bench in garden
A girl or is she a woman
Experienced, jaded, pleasurable …
Comes and sits by him
Does it matter who she is?
Why disheveled? Why alone?
Has she come to me… thinks he
Abruptly she turns with a smile
Looking deep in his eyes
As a deep penetrating kiss
Asks – Do you know who I am?
How beautiful? Alluring, intrepid, vulnerable and caressing
Do you know? She continues, what I feel,
When they call ‘Say cheese’?
Rascal, stupid journos
Dead memories for the living mind’s need…
As milk sucked from my breasts
Require to be curdled in my seeds
… Bloody sons
… Say Cheese
I hate aesthetics
The science of art
I just want to fly
With such apple flower feathers
To see the moonlit mountain forests from clouds
Images blue, yellow, green
With those queer sensations
Verifying the mental screen
Flashing those beautiful buds
Isn’t a beautiful way to kill one?

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बाहरी कोलाहल से दूर
जब मैं अपने ठिकाने पहुंचता हूँ
धुंध में अलसाए पेड़
या कि गुजरते बादलों में ठहर गए पहाड़ की तरह
खुद को पाता हूँ।
जब मैं अपने ठिकाने पहुँचता हूँ
तो वहां शिवली के बिखरे फूल
तारों की तरह बीती रात के सयास सपनों के गवाह होते हैं
हरी कास से झाँकते सफेद फूल, अनछुए
मेरे मनोजगत के साक्ष्य होते हैं।
मेरा एक अकेलापन है
बेवजह कुछ यूहीं डाही है
अनुभवों के बीच मैं जब कोई संबंध खोजता हूँ
बहते प्रवाह में कोई पत्थर तलाश रहा होता हूँ
धुंध के साए में मैं खुद एक नद होता हूँ।

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वैश्विकता की कल्पना, हर विचार चाहे वह साइंटिफिक या दार्शनिक हो या फिर मजहबी, आधुनिक सोच की आधारभूत स्थापना बन चुकी है। और यही आज जीवों के अस्तित्व के सामने की समस्या की जड़ भी है। वैश्विकतावादी मानस वह है जो कि सत्य के किसी एकांगी पक्ष के सार्वलौकिक और सार्वभौमिक होने का दावा करता है। और इस दावे को किसी सेल्फ इविडेंट ट्रूथ की तरह सत्य मान लिया जाता है। यह फरेब मजहब, राजनीतिक विचारधारा आदि में एक दोहरे चरित्र का निर्माण करते हैं। एक दोहरापन जो दर्शन के स्तर पर होता है और विविधतावादी हीदेन विचारों का इस पहलू से भी विरोधी होता है कि यह मूलभूत रूप से ऐसे समाज से डरता है जो मानव को नैतिकता, धर्म और सत्य की खोज के लिए व्यक्तिगत रूप से प्रेरित करता है।
ऐसा वैश्विकतावादी मानस दोहरेपन के चश्मे से दुनिया देखने का आदि होता है जिसमें सत्य, नैतिकता जैसे समष्टि भाव को व्यावहारिकता के साथ जोड़ दिया जाता है। ऐसे विचार निहायती खतरनाक होते हैं क्योंकि इनका सफल बहुत आसान होता है। इसलिए क्योंकि इनमें लोगों को संघटित करने की एक नैसर्गिक शक्ति होती है। ऐसा अहंकार नए साम्राज्य, युद्ध और विजय की भाषा में सोचता है। चूंकि सफलता न्यूनतम समान विचारों से अभिप्रेरित होती है, वैश्विकतावादी विचार उपभोगवादी-भौतिकतावाद के सरल सिद्धांत से चालित होता है। यह सफलता का मंत्र है जो यथार्थ में हिंसा और दमन का ही दूसरा नाम है। इस प्रकार सफलता के चलते यह दोहरा चरित्र एक मान्य पूर्वस्थापना बन जाता है। जिसके आधार पर यह और सफल होते जाता है। यह सफलता को दुष्चक्र है। वैश्विकतावाद का दावा करने वाले न सिर्फ वृहद सेट या समुच्चय के खिलाफ हमेशा हिंसक रूप से सफल रहते हैं जो नैसर्गिक रूप से मानव को उदात्त की खोज में प्रेरित करता है वरन् वह उस वैश्विकतावाद को मानने वाले में भी खुले और उदात्त विचार का दमन करता है। तो क्या यह गलत है कि ऐसे वैश्विकतावादी दर्शन आपस में लड़े और भिड़ मरें?
लेकिन असली समस्या क्या है? बात यह है कि यदि मानव निर्मित साइंस, तकनीकी की विनाश लीला की सीमा यदि मानवजाति तक ही सीमित होती तो कोई बात न थी। यह विनाश लीला विभिन्न जीव-जंतुओं को लील रही है। तो इस स्तर पर मानव अस्तित्व, विचार और दर्शन में हम कैसे नैतिकता की बात करते है वह तो समझ के बाहर की बात है। इसके लिए वैश्विकता जिम्मेदार है।
कारण यह है कि किसी विचार, दर्शन पर वैश्विकता का आरोपण न सिर्फ एक छोटे, सीमित और संकीर्ण सब सेट, को उस विस्तीर्ण अस्तित्व के विरोध में खड़ा करना है, जो सबको समेटे या धारण किए होता है। सेमेटिक और पश्चिमी विचार का विकास इसी प्रकार के खंडित विचार की श्रंखला है। मजहब में इस्लाम और ईसाइयत या फिर मार्क्‍सवादी चिंतन सभी अपनी जड़ और परंपरा की समग्रता को नाकार कर ही तो अपनी उपस्थिति या फिर प्रासंगिकता दर्ज कराते हैं। और यह तरीका कितनी अभिन्न रूप से उस विकसित सोच का अंग है। कितना आश्चर्य हैं कि हम इस दृष्टिकोण का प्रयोग और आरोपण सनातन परंपरा और उसके भिन्न अवयवों के संबंधों काकरते हैं, जैसे कि बौद्ध व तथाकथित हिंदू धर्म का और ईसाइयत व जूडाइज्म का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक परिवेश एक ही हो। मार्क्‍सवाद का वर्ग भी तत्कालीन वैश्विकता के नवोन्मेष में पनपा ऐसा ही विचार है। आधुनिक राजनीति भी ऐसे ही जुमलों की भाषा में सोचती और जीती है।
हिस्टोरिकल या पोलिटिकल मायने में वैश्विकता का क्लेम करने वाले विचार सफल रहे हैं, न सिर्फ सफल रहे हैं बल्कि वे आज इस स्थिति में पहुंच गए है कि विस्तीर्ण वृहद् समुच्चय जो इसे धारण किए हुए था आज कुछ इलाकों और परंपराओं तक सिमट गया है। और जिन जगहों पर वह बचा हुआ है निरंतर इस विजातीय कुछ अकृत्रिम विरोधी विचार से टक्कर ले रहा है। वैश्विकतावादी (यथार्थ में संकुचित दृष्टि वाले एवं स्वयं के विचार, दर्शन और परंपरा को दूसरों पर थोपने वाले) की समस्या यह है कि ऐसे किसी वैश्विक सत्य पर अधिकार जमानेवाले ये कोई एक नहीं हैं। कई लोग हंै, सफल हैं। (1)
कई मजहब हैं, वैचारिक दर्शन हैं, राजनीतिक विचार धाराएं हैं और इनका खंडित चित्त लोगों को अस्तित्व से दूर ले जा रहा है। कोई आश्चर्य नहीं इनमें से कुछ कयामत के दिन का इंतजार कर रहे हैं और दूसरे कई जिनके के पास ऐसी भवितव्यता का इतिहास नहीं, महाविनाश की कल्पना साहित्य, सिनेमा और पापुलर कल्चर की नि:सारता में स्वर पा रही है। लेकिन यदि ऐसा न हो तो आश्चर्य हो। जीवन, समय या समग्र अस्तित्व को एक चक्र में देखने वाली परंपराओं जिन्हें कदाचित हीदेन कहा जाता है, के ये धुर विरोधी प्रस्थान है।
क्या हमनें कभी गौर से सोचा या अनुभव किया है कि आधुनिक साइकोलॉजी के अनुसार अनुभूतियां भले ही वहीं हो उनका प्रभाव विभिन्न देश-काल के लोगों पर क्या एक जैसा होता है? बात थोड़ी कम कही-सुनी है। साइकोलॉजी मानव अनुभूतियों को वैश्विकता की सूची में रखती है। इतना भर नहीं लोग पशुओं में भी उन अनुभूतियों को पढ़ लेते हैं। लेकिन मेरा निवेदन यह है कि ये अनुभूतियां भले ही एक सार्वदेशिक, सार्वभौमिक, सार्वजनिक कही या समझी जाने वाली भाषा अंग्रेजी के माध्यम से एक समझी जाती हो, ये एक नहीं है। एक इसलिए नहीं है क्योंकि मानव परिवेश भिन्न है, भाषा, संस्कृति भिन्न है, मजहबी-सांप्रदायिक विचार भिन्न है, दार्शनिक प्रस्थान भिन्न है, प्राकृतिक परिवेश, जेनेटिक बनावट भिन्न है। स्थानीय भौतिक परिवेश सर्दी-गर्मी, आबो-हवा, खनिज, वनस्पति, सूर्य-चंद्र आदि से चेतना पर होने वाले परिणाम, परिणामों की श्रंखला और उससे विकसित होने वाली विशेषताएं अलग हैं। क्या ऐसी सब विभिन्नताओं के चलते हम अनुभूति को वैश्विक कैसे मान सकते हैं? उदाहरणार्थ एक मां अपने 6 साल के बालक बाजार में एक सड़क हादसे में खो देती है। यह घटना मान लें – फलिस्तिन गाजा पट्टी में, लॉस एंजेलिस अमेरिका में, काबुल अफगानिस्तान में, कोलकाता भारत में, लाहौर पाकिस्तान में, हरारे जिम्बाव्वे, पेरिस फ्रांस में घटित हो तो क्या इस दुर्घटना की अनुभूति इन स्थानों की रहवासी माताओं पर समान रहेगा? तो अनुभूति सापेक्ष है। जब हम प्रेम, क्रोध, ममता, करूणा, लालच, कामना आदि भाव या अनुभूतियों के बारे में बात करते हैं तो वे एक स्थानीयता से जुड़ी होती है। स्थानीयता का संबंध बड़ा गहरा है। वैश्विकता का सारा प्रयास व्यक्ति के इस स्थानीय संबंध को तोड़ना और किसी अज्ञात लेकिन रोचक, स्वप्नील परिकल्पना से जोड़ना है।
परिवेश-प्रकृति हमारी अनुभूतियों के स्तर, प्रकार, गहराई और भी ऐसे कई सूक्ष्म तरीकों से प्रभावित करता है। जब एक उत्तर भारत के किसी गाँव में कोई पिता अपने बेटे को डाँटकर ठीक ढ़ंग से बैलों का चारा काटने को कहता है, या ईरान का कोई बुनकर अपने बेटे को फारसी में कालीन की ठीक से गाँठ बांधने को कहता है तब उनका संप्रेषण और उसकी अनुभूतियां इतनी स्थानीय होती है कि वैश्विकता के लिए कोई जगह ही नहीं बचती।
वास्तव में सापेक्षता की खोज के वृहद परिणामों को मानवजाति समझने को तैयार नहीं है। खासकर वैश्विकता के पक्षधरों को जो विभिन्न छलावों में एक अंधविश्वास को आगे बढ़ाते रहना चाहते हैं। लेकिन वैश्विकता जिस भाषा में कला, भाषा, जीवन, साहित्य और लोक जीवन की बात करता है वह निहायती गड्डमड्ड है। क्योंकि पहले तो इस विचार ने और इसके साथ विकसित विज्ञान, तकनीकी आदि ने लोगों को स्थानीयता से तोड़ा है, उनका स्थानीय प्रकृति से भेद कराया है, और एक वैश्विकता के बोध की कल्पना को बुना है। आधुनिकता, साइंस-तकनीकी और औद्योगिकी इसी वैश्विकता का नतीजा और विस्तार है। यह वैश्विकता का फरेब इस लिहाज से सफल है कि वह हिंसक है। लेकिन साथ ही इस मायने में यह असफल भी है कि यह एक व्यक्ति को अस्तित्व की संतुष्टि नहीं दे सकता। मैं किसी वैश्विक साहित्य सिनेमा, भोजन, वस्त्र का आस्वादन कर सकता हूँ, लेकिन अपनी जमीन, गाँव, समाज, शहर, संस्कृति और परंपरा से कटकर किस प्रकार वैश्विकता के चिकने धरातल पर जी सकता हँू? खासकर तब जब कि ऐसी वैश्विकता में व्यक्ति के लिए कोई एक्जेस्टेंशियल धरातल न हो।
भूमंडलीकरण वैश्विकता का महत्वपूर्ण पहलू है। इसके कारण और इसके सफलता होने से आर्थिक रूप से पिछड़े समाजों में लोगों के बीच खास कर जीवनस्तर के आधार पर सांस्कृतिक विखंडन पैदा हुआ है। जो लोग इस वैश्विकता के साथ हैं सफल हैं इसके साथ न चल सकने में सक्षम या बाहर फैंक दिए गए लोग हाशिए पर हैं। ऐसा नहीं कि यह पारंपरिक पश्चिमी दृष्टिकोण ही है। जहां स्थानीय परंपराओं का हस हुआ है और रिक्त हुए स्थान को इस वैश्विकता आधारित विचार ने भरा है वहां तेजी से स्थानीय पारंपरिक उपभोगवाद का लय वैश्विकता आधारित उपभोगवादी विचार ने ले लिया है। चीन, जापान, सुदूर पूर्व के देशों में यही हुआ है। आज जिस तेजी चीन अफ्रीका, म्यांमार, पाकिस्तान, अफगानिस्तान आदि देशों में उर्जा, खनिजों की दौड़ में आगे बढ़ रहा है और जिससे पश्चिम और अमेरिका आक्रांत हो रहा है वह स्थानीय उपभोगवादी संस्कृति के वैश्विकता को सफलता से अंगीकृत करने का उदाहरण है। आने वाला समय खासकर चीन को सजग होने का है। दो बाते ध्यान देने लायक है। चूंकि चीन के पास मध्यकालीन वैश्विकतावाद परंपरा का अनुभव नहीं है, उसके विस्तार की योजनाओं में छिपे भेदक तत्वों से वह अनभिज्ञ है। अफ्रीका के देशों में तेल और खनिज के लिए किए गए करार से लाभ पाने के लिए जब विभिन्न समूहों में होड़ होगी, तो उन अतिवादी पॅन इस्लामिस्ट समूह की करतूतों की चिनगारियों से चीन भी बचा नहीं रह सकेगा। दूर न जाएं जो यही घटनाएं ग्वादर या मध्य एशिया से आने वाले तेल आदि को भी प्रभावित करेंगी। चीन जो पश्चिम की तरह पॅन इस्लामिस्ट सोच को खुद की ही श्रेणी के वैश्विकतावादी देखता है, इस बात को नहीं पहच रहा कि वह एक सीढ़ी पीछे वाला है। साथ ही पूर्ववर्ती काल का खलीफा है। इनके बिखरे और खतरनाक आत्मघाती जज्बे का जवाब यहां नहीं है।
भारत स्थानीयतावादी सोच का अंतिम वैचारिक किला है। यहां की हीदेन विविधता ने वैश्विकतावाद को कभी पनपने नहीं दिया है। और चिंतन के स्तर पर यह उस वैदिक विचार का विस्तार है जहां जीवन ऋत से प्रकृति के वृहद चक्र से जुड़ा हुआ है। दूसरी खासियत यह है कि चीन या जापान से विलग इसने लंबे समय तक वैश्विकता के विचार को देखा, जाना और परखा है, इस श्रेणी में वह और कुछ हद तक ईरान दो ही संस्कृतियां है। और विरोधी दार्शनिक प्रस्थान है, भारत के हित में ईरान की उपयोगिता को जानना जरूरी है। कुछ कारण है कि लगभग 700 साल के इस्लामी और 200 साल के ब्रितानी शासन के बाद भी उस भारतीयता का वजूद बचा रहा है। भले ही वह अनेक स्तरों पर हिंसक वैचारिक प्रतिरोध झेल रहा हो, चाहे अनचाहे आने वाले समय में भारत की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण रहने वाली है। और हमें अपनी जिम्मेदारी के लिए अभी से तैयार रहने की जरूरत है। आह्वान अपने धरातल, मूल्यों को समझने, ठीक से आत्मसात करने की उसमें अपनी आस्तित्विक ऊर्जा निवेश करने का है।
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(1)आज पश्चिम और मध्यपूर्व के मानस में जो बेखुदी की भावना है वह खतरनाक है। उस राजनीतिक वैचारिक स्तर के तनाव से भी ज्यादा भयावह है क्योंकि यह बेदिमागी बेखुदी अपने सत्य को सबके गले उतारने के लिए शैतानियत की कौन सी तह पर उतरेगी इसकी कल्पना किसी को नहीं है।
(2)चीन का स्थानीयतावादी कल्चर के भूमंडलीकरण के दौर में सफल होने में उसका इतिहास के महत्वपूर्ण विकास क्रम से दूर रहना है। चीन की मध्यपूर्व और अफ्रीका में मध्यकालीन मोहम्मदन या ईसाई औपनिवेशिक विचार और परंपरा से एक दूरी रही है। सीधे वैचारिक संबंध और उससे उठने वाले द्वंद्वों की अनुपस्थिति में नए करार करने में वह अन्य देशों की तुलना में अधिक सुविधाजनक स्थिति में है। वह उन अतियों से बचकर और उसमें सुधार कर आगे बढ़ रहा है जो पश्चिमी देशों ने की है। ऋण के साथ कोई शर्ते नहीं हैं, लोकतंत्र, मानवअधिकार की सच्ची-झूठी और दुर्दात तानाशाहों को समर्थन की दलीलें नहीं है। किंतु सीधे संबंधों के न होने से जो आपसी समझ और दृष्टिकोण की कमी है उसे लेकर चीन को सजग होना जरूरी है।

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