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Archive for मार्च, 2010

Forlorn Leaf – 17

Strange is this winter
Rains persisting till December
In the clouds and layered mist
Dark dissolving trees in slumber
Strange in their content
Cranes and white falcons
From distant land unknown
Come to my lake garden
In the graying fulvous
Acacia lushly green and dark
Fields swollen by fine shower
In moist eyes unbroken sorrow stark

A strange year this is
Autumn has passed
Without arrival of cloud kingdoms
Green persisting so long
Deadly silent rejuvenation stream
Pallid lemon, mango and neem
No humming bees, no butterflies
In chaos a struggling paradise
Out there, distant far
Which tree is that
Unruffled by these happenings
How such existence possible at all?

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Forlorn Leaf – 16

Those smoke like clouds come
Veil the summer sky
With mere presence they open
Mountain, trees and streams to joy
Broken by relentless journey
In thirst hunger and dreams
In forest plain and hills
The highest gift they bring
Deep in joy on mount high
Through raindrops clouds and winds
Walk on then crossing the precipice
In secret unity of nature resign
The joy of which no impression remain
Doubts linger and drive to experience again
Somewhere it exist always
To be shrouded by mind again and again

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Forlorn Leaf – 15

Sizzling waves of summers
Stands she dazed under sun
Hands behind her head, calm, reflective
Dancing ripples on the fields golden
Ocean of mercury below a Mango tree I
Graying sky at horizon
Restless brine in deathless tinge
In the same indecision my heart
By night soaring high in clouded full moon sky
Sometimes cold stones sometimes weightless
In shadows sometimes in light
And in between those flashes of pureness
A perfect tranquility
Those blanks in memories
Whose fleeting steps leave me doubting
Wedded to restlessness maddening

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Forlorn Leaf – 14

 

 Freewill a journey vey long

Love woven web

On forehead frisky locks

A sweet discontent, journey very long

Eyes see shades

From opposite to chosen dark

Marvel at the consummation

Fomenting I the sea emerald

Frolic wishes in eyes

Breeze in curls entwine

Weary motioned eyelids

Glimpse in swelled time

A wine wave flitted

Shades maroon to dark

In rare dense clouds

Moonshine in untamed leopard

Sometimes locks, I, sometime leopard

Each happening enhance unsatiated thirst

A journey very long

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प्रस्तुत पत्र में मुख्य विचार यह है कि संसार में संस्कृतियों के दो प्रवाह हैं – एक सनातन को मानने वाला प्रवाह और दूसरा खंड को मानने वाला प्रवाह। दोनों के अपने चक्र हैं और समष्टि के स्तर पर जुड़ाव के चलते और कार्य-कारण के सूक्ष्म व्यापार के तहत उनका परस्पर महत्व बढ़ता घटता रहता है। खंड प्रवाह में एक आग्रह होता है अपने विचार को स्थापित करने का और सनातन प्रवाह में एक आग्रह होता है असहिष्णु तत्व की अवहेलना का। ये दो ऐसे धुर विरोधी स्वभाव है जिसपर चिंतन अंतर-सांस्कृतिक विमर्श में आवश्यक है। इस विचार पत्र का उद्देश्य संस्कृतियों को समझना है, उनमें विमर्श की संभावना को परखना है। निवेदन है प्रयास को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाए। बीच और अंत में कुछ भारतीय भूमिका पर भी विचार किया गया है।
पुनरावृत्ति की आवश्यकता नहीं कि समाज ऐतिहासिक रूप से खुले से बंद, उदात्त से संकीर्ण की ओर प्रवाहित होते हैं। ये निरंतर रूढ़ीवादी, पाखंडी और दमनकारी होते चले जाते हैं। इसके आंतरिक और बाहरी कारण हैं। दुनिया भर में पुराने समाज जो अपनी परंपरा को अविच्छिन्न देखते हैं, जैसे भारत, चीन, जापान आदि में यह बात कमोबेश देखी जा सकती है। यहां ज्ञान को एक सनातन प्रवाह के रूप में देखा जाता है। लेकिन जिन समाजों में किसी विशिष्ट काल के मजहबी विचारों को सत्य मान लिया गया है तथा इससे पूर्व के विचारों को भुलाने का प्रयत्न किया जाता है और इस पूर्वग्रह के साथ सेंस ऑफ हिस्ट्री को निर्मित किया जाता है, उन पर यह बात लागू नहीं होती। वहां ज्ञान किसी सनातनता में प्रवाहित नहीं होता वहां खंड प्रवाह होता है। वह तो खंडों में विशिष्ट संदेशवाहकों द्वारा प्रसारित किया जाता है। अस्तु।
खंड प्रवाह में सेंस ऑफ हिस्ट्री में ज्ञान का स्वभाव और स्वरूप भिन्न दिखता है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। ऐसे में ज्ञान को धारण करनेवाली शिक्षा प्रणाली जीवन को विखंडन मंे देखने उसे बाँटने और उस आधार पर प्रभाव, उपयोगितावादिता या उपभोग में विश्वास करती है। जब ऐसे कोई खंड-प्रवाह वाले विचार बलशाली होते हैं वे संकीर्ण किंतु मजबूत विचाराधारा को सार्वदेशीयता देने का प्रयत्न करते हैं। लेकिन क्या सनातन प्रवाह की कोई विचारधारा होती है और यदि होती है तो उसकी स्थिति क्या है?
बात ज्ञान की हो रही है, तो ज्ञान की कोई एक वैश्विक शिक्षा प्रणाली हो ही नहीं सकती। कि एक निर्धारित विषयक्रम हो जो दुनिया के किसी भी देश, संस्कृति, भाषा और परंपरादि में पलने वाले किसी भी आयु विशेष के विद्यार्थी के लिए समान रूप से उपयोगी हो। यदि हम ऐसा मानते हैं, तब हम यकीनन एक ऐसे जगत में विश्वास करते है जो बड़े मजबूत, दृढ़ और गहरे आधार पर वैश्विक है। और खास बात यह कि वह उन्हीं विचार या विश्वासों के स्तर पर वैश्विक है जिनमें हमारी शिक्षा प्रणाली विकसित हुई है। संक्षेप में यह सभ्यता के कल्चरल इंपीरियलिज्म का सूक्ष्म तर्क है, जिसकी धारणा मत्स्य-न्याय में अवस्थित है। जहाँ विचार भले ही हिंसक एवं अतिचारी हो, प्रबल और सफल होने से नैतिक और सत्य हो जाते हैं। सहज रूप में ऐसे कल्चर में सत्य को लेकर एक सीमित समझ होती है और वह विश्वास का अनुषंगिक होता है, उसे धारण करने वाला नहीं। कुछ संदर्भ से हटकर। खंड प्रवाह संस्कृति में जो औपनिवेशिकता होती है वह साइंस-तकनीकी, फलसफे के माध्यम से जीवन को भी प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए इस परिवेश में जो साइंस विकसित हुआ है वह एक लघुकालीन दृष्टि से प्रेरित है। यहां जीवन को व्यक्तिगत देखा गया है सम्यक प्रवाह के रूप में नहीं। तो वर्तमान पीढ़ी के भोग सर्वप्रधान हो जाते हैं। समानता के सपने में उपभोगवाद का प्रचार किया जाता है। उर्जा के मांग की आपूर्ति प्रकृति चक्र के उपादानों जैसे कृषि, पशु, वन आदि से हटा कर पेट्रोलियम आधारित की जाती है। जब आधुनिकीकरण के नाम पर प्रतिव्यक्ति औसत दो बीघा जमीन वाले देशों में खेतों से पशुओं को बेदखल कर ट्रेक्टर और तेल लाए जाते हो, रसायनिक खाद और तेल पर सब्सिडी के नाम पर पेट्रोलियम उत्पादकों को सब्सिडाइज किया जाता हो और फिर ग्रीन गैस प्रभावों से नष्ट किए पर्यावरण की रक्षा के लिए और प्रकृति के अनुरूप चलने वाली जीवन शैली और पशुधन आदि को ही दोषी ठहराया जाता हो, तो बात खंड प्रवाह फलसफे की अनैतिकता सामने आ ही जाती है। यह बात अलग है कि शक्तिशाली लोगों के विश्वास और राजनैतिक वैचारिक प्रश्रय इन्हें प्राप्त होने से ये प्रबल है। लेकिन यह गुब्बारा लंबें समय तक नहीं फूल सकता इसमें संदेह नहीं।
खंड-प्रवाह से जन्मा वैश्विकता का विचार और जगत यथार्थ में बड़ा कमजोर है क्योंकि इसके मूल मे अतिचार और हिंसा है। कुछ समय के लिए तो यह अत्यंत प्रबल हो सकता है क्योंकि उसकी नैतिकता कुछ खास नियमों से संचालित होती है सत्य से नहीं। ऐसे विचारों में हमें सुसंगत तर्कनिष्ठता और सामंजस्यता भी दिख पड़ती है, जो सीमित दृष्टि में बड़ी ठीक भी होती है। लेकिन उसकी कमजोरी उन विचारों को सार्वजनिक या सार्वलौकिक कहने में दिख जाती है। जो नहीं है वह बनने की चेष्टा उसे बेनकाब कर जाती है। कई बार आश्चर्य होता है कि मजहबों में नैतिकता के पैमाने किस प्रकार अलग-अलग होते हैं। बावजूद इसके, हद बेशर्मी तक खींच कर उसे सही ठहराया जाता है। जन्म, विश्वास, परंपरा के आधार पर विशेषधिकार की मांग की जाती है और दूसरों के अधिकारों का हनन भी किया जाता है। और फिर भी वैश्विकता का दंभ भरा जाता है। सनातन प्रवाह को मानने वाले समाज को मानने वालों में यही सब बातंे नहीं होती। वहां एक अंतमरुखता होती है जिसमें व्यक्ति का प्रतिकार बहुत सूक्ष्म और दीर्घकालीन दृष्टि से प्रवृत्त होता है। लेकिन वे इसमें वैश्विकता का दावा नहीं करते और परिवर्तन के लिए तत्पर रहते हैं। वे इस कारण अधिक नैसर्गिक होते हैं कि यहां सामाजिक स्तर पर विचार वैयक्तिक निर्णयों का परिणाम होते हैं। सहज रूप से यह एक क्रम का निर्माण करते है जिसमें परिवर्तन के लिए आंतरिक तंत्र स्थापित होता है। तो जहां सनातन प्रवाह की दृष्टि से संपन्न समाज खंड प्रवाह की स्वीकार करते हैं, प्रतिरोधी की संकीर्णता के चलते उन्हें वही स्वीकार्यता नहीं मिलती। ये मूलभूत अंतर है। आज सभ्यताओं के संघर्ष यथार्थ में खंड प्रवाह में सफल हुए समाजों का संघर्ष है। इनका सनातन प्रवाह समाजों से विरोध औपनिवेशिक और आपस में विरोध प्रतियोगी है।
खंड-प्रवाह के विचारों में संघीय समरसता एक उपयोगी गुण होता है जो लौकिक और राजनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण होता है। परंतु ऐसी परंपराओं में वैयक्तिक मानस बँटा हुआ होता है। विशेषकर विचारशील मानस के भीतर एक विचित्र असंयतता होती है। वह असहज होता है क्योंकि किताब, विश्वास और विचार करने की रिवायत के परे और अधिक बुनियादी स्तर पर जो एक सम्यकता या विवेक का बोध होता है उसे झुठलाना आसान नहीं होता। और वैचारिक रूप से परंपरा को लोकप्रिय दृष्टि से समझने और मानने का दबाव जब फूटता है तो वह दूसरी अति पर जाकर भूत को गलत ठहरा कर एक नए मजहब की इबारत रचता है। तो इसका भी एक चक्र है।
वैश्विकता तो उसी प्रकार संभव नहीं जैसे कि धरती के हर क्षेत्र में निसर्ग और उसके उपादान एक प्रकार का होना संभव नहीं। भूभाग विशेष में विकसित होने वाले मनुष्यादि जीव-जंतु एवं पेड़ पौधों में पारिस्थितिकी को लेकर एक तंत्र, एक समझ पैदा होती है। आचरण को लेकर एक धारणा, धर्म की प्रेरणा उत्पन्न होती है उसी प्रकार ज्ञान को लेकर एक दृष्टि का विकास भी होता है। यह नितांत स्थानीय होती है। स्थानीय पारिस्थितिकी का विकासवाद से संबंध गहरा है वह भौतिक गुण-धर्म तक ही सीमित नहीं। वह बौद्धिक भी है और फिर बौद्धिक विचार का अंश भी है। ज्ञान को मानवजाति का विशेषाधिकार नहीं मान कर उसे जीव- विकासवाद की प्रक्रिया के रूप में देखंे तो ज्ञान का विकास भी परिवेश पारिस्थितिकी सापेक्ष है। विकासवाद के इस नैसर्गिक नजरिए ने जहां खंड-प्रवाह वाले मजहबों की चूलें हिला दी हैं, इसके सनातन परंपरा पर परिणामों पर चिंतन की जरूरत हैं। जो वास्तव में विकासवाद से अधिक मजबूत हुआ है। इस पर आगे। ज्ञान का जीव के माध्यम से परिवेश से जो अस्तित्व के स्तर पर संबंध है उसे ध्यान में रखने की जरूरत है।
खंड प्रवाह के परिवेश में आज हम इतिहास, विज्ञान, भाषा-साहित्य,गणित आदि को ऐसे वैश्विक विषय के रूप में देखते हैं जो स्थानीय परिवेश के ज्ञान को हर मामले में पीछे ढकेल देता है। यह मान लिया गया है कि सभ्यता का विकास का पाया इसी शिक्षा मॉडल पर निर्भर है। एक उदाहरण से समझ सकते हैं। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र के साथ ही पारंपरिक, स्थानीय चिकित्सा पद्धतियाँ भी है। अब हम अन्य चिकित्सा पद्धतियों को अवैज्ञानिक और कम प्रभावशाली मानते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह ज्ञान नहीं है या आधुनिक चिकित्सा प्रणाली ही पूर्ण ज्ञान है और सर्वलौकिक समान प्रभावशील है। या आर्किटेक्चर जैसा विषय लें जो नितांत स्थानीय होना चाहिए। हमारे गलत नजरिए ने लगभग दुनियाभर में गृहों को वैश्विक समस्या बना दिया है। लेकिन जहां समस्या पैदा कर फिर उसका निदान एक विशाल उद्योग बन गया हो, हम इसे एक बड़ी व्यवसायिक संभावना के रूप में भी देख सकते हैं। इसने कृषि, लोक-कला और जीवन को भारी नुकसान पहुंचाया गया है। इन सब बातों का कोई अन्वेषण ही नहीं होता, अध्ययन किए जाते है तो वे विकल्प को लेकर बड़े भयभीत या याचनापूर्ण होते हैं।
खंड प्रवाह का प्रभाव विलक्षण है। इसमंे विकसित शिक्षा की विखंडन की पद्धति से आज हम सनातन प्रवाह का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए भारतीय साहित्य में इस स्वतंत्रता को दमन के विरुद्ध प्रतिरोध देखते हैं। या आण्डाल, मीरा, जनाबाई या तंत्र को नारी मुक्ति विमर्श से पढ़ते हैं। वर्ण व्यवस्था को इस्लामी भाईचारे के परिप्रेक्ष्य में या ओरिएंट को पश्चिम के हिसाब से देखते हैं। यह शिक्षा इस भीतर तक घर कर गई है कि हद दर्जे के ईमानदार, विचारशील और संवेदनशील लोग भी इस तर्क के प्रवाह में बहे चले जाते हैं। शायद यह समय है कि खंड-प्रवाह अध्ययन में भारतीय साहित्य एवं कला की परंपरा में विभाजन किया जाना चाहिए जिसमें विभाजन का आधार होगा खंड-प्रवाह शिक्षोत्तर और खंड-प्रवाह शिक्षापूर्व साहित्य।
वैश्विकता की सफलता एक विशिष्ट विचार के अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाने की घटना है। हिंसक किंतु सफल। और हिंसक सफलता तब तक ही उपयोगी होती है जब तक कि बहुसंख्य अहिंसक होते हैं क्योंकि जिस दिन बहुसंख्य लोग हिंसक हो जाते है तब नए खोज की ओर हम प्रवृत्त हो जाते हैं। अब यदि यह मसीहा के आने का समय है तो अंतिम मसीहा को मानने वाले का विचार अंत की ओर खींचेगा जहां क्लेश और संघर्ष होगा? क्या हम ऐसे समय के नजदीक है? और क्या यह परिवर्तन की बेला भी भीषण हिंसक होगी? ये प्रoA विचारणीय हैं। इससे अधिक विचारणीय और मौजू प्रoA यहां यह है कि ऐसे में युग धर्म क्या है? यह प्रoA भारत संदर्भित है क्योंकि यह सनातन प्रवाह और खंड प्रवाह की समझ और अनुभव दोनों शायद इस भूभाग पर तो बचा हुआ है।
खंड प्रवाह वाले समाज में एक विशेष समरसता, उर्जा, गति होती होती है जो काल विशेष में अत्यंत प्रभावशाली सिद्ध होती है। कुछ इतनी कि वह काल के साथ संबद्ध देश की सीमाओं का भी अतिक्रमण करती सी जान पड़ती है। लेकिन ज्यों ही ऐसे खंड प्रवाह समाज सीमाओं की वर्जना को तोड़ते है वे उस धर्म का भी अतिचार कर जाते हैं जो उन्हें धारण करता है और इस प्रकार वे अवनति को प्राप्त हो जाते है। तब सनातन प्रवाह की ओर प्रवृत्त होना पड़ता है। सनातन प्रवाह सत्य का आग्रही होता है। उदाहरण के लिए भारतीय दर्शन में नैतिक व्यवहार को उतना महत्व नहीं दिया गया है जितना कि सत्य के ज्ञान और उसकी खोज को। इस बात की तस्दीक अल बेरुनी से लेकर ईसाई मिशनरियों करते रहे हैं। इसे कई बार पाखंड के रूप में भी देखा गया है। लेकिन सच्चई यह है कि नैतिक व्यवहार स्मृति प्रतिष्ठित है, जो देश-काल-कलना से बाधित है। और सत्य जो भूत, वर्तमान और भविष्य में अपरिवर्तनशील रहता हो, वह ईश्वर के प्रश्वासरूप श्रुति का भी ध्येय है। यहां न आस्तिक, नास्तिक का भेद मायने रखता है और न जड़ चेतन का। ऐसे आग्रह वाली परंपरा में ज्ञान एक प्रवाह होता है, जो जीव के प्राणों का धारक होकर अभ्युदय का कारक होता है और आत्मा का स्वरूप होने से मुक्ति का बोधक नि:श्रेयस होता है। जो परंपरा श्रुति को प्रधान मानती है और स्मृति को गौण का दर्जा देती है साथ ही जहां स्मार्त विचार विभिन्न विजातीय तत्व और उसके जातीय तत्वों से अंतरसंबंधों से प्रभावित होते हैं, वहां वैचारिक या व्यवाहारिक संगतता की सीमाएं होती हैं। तो भले ही ऐसी सनातनता सुदृढ़ नहीं दिखती, वह जानने वाले को विशेषाधिकार नहीं वरन् विशेष कत्र्तव्य देती है, भोग को योग से सीमित कर देती है, इसका प्रसाद वह सहज सुलभ अनुभूति होती है जिसमें व्यक्ति समष्टि से जुड़कर न सिर्फ मनुजता या जीवत्व वरन संपर्ण अस्तित्व के साथ तादात्म्य पा जाता है। एक संवाहक बनने सुफल प्राप्त करता है।
भारत में ज्ञान की दृष्टि कुछ इस आधार दर्शन पर टिकी है। लेकिन उस सनातन परंपरा को प्राप्त करना कैसे संभव है? संभवत: सनातन परंपरा के उत्तराधिकारी के सामने सबसे बड़ा प्रoA यही है। स्वयं की पहचान के संबंध में इस व्यक्ति का प्रस्थान नकारात्मक होगा। सनातन प्रवाह में समष्टि के बीच व्यष्टि को सकारात्मक रूपों में नहीं व्यक्त किया जा सकता। इस अर्थ में कि मैं स्वयं के सनातनीय सिद्ध करने के लिए तो दूर कि बात है उसे जानने के लिए भी यहां तक की परखने के लिए भी प्रेरित नहीं होता हूँ। क्यांेकि मेरा सनातनी होना उस हिस्टोरिकल मायने से कभी सिद्ध नहीं होता, सिद्ध हो नहीं सकता। यहां मेरी परंपरा में स्वतंत्रता और वैयक्तिकता की विशद सीमा है वह जिस ढीले-ढाले मायने में परंपरा है वह दूसरी सुसंगत, संकीर्ण, समरस परंपरा से भिन्न है। पर एक थोपे हुए बोध के परिप्रेक्ष्य में ही तो यह सब बात हो रही है। यह सभ्यता जिस तेजी से अपने कुकृत्यों को भूल जाती है इस्लाम के जहीलिया जैसे वह अविश्वसनीय है। इसे क्षोभ तब ही होता है जब इसके सामने कोई इसके रूप में ही खड़ा होकर दम ठोकता है।

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India has sought Saudi Arabia’s help in curbing terrorism emanating from Pakistan; this request despite historical and staunch support of the said country to Pak role in Kashmir. Both countries even signed agreement on countering terrorism. I wonder if both countries arrived to a common definition of terrorism before agreeing to counter it. One also wonders why Shashi Tharoor finds in Saudi Arabia an interlocutor for Indo-Pak.
As argued earlier on this blog that growth of democracy and real liberalism in Islamic world is possible only through Iran. But the West and East owing to short-sightedness and weakness to withstand the hardliners found it more convenient to deal with an autocratic, dictatorial Saudi Arabia (which is also indirectly exporting such values along with fundamentalist version of Wahhabi Islam).
The autocratic regime over the years has reared the hardliners and has used them to counter the liberal and democratic voices. Meanwhile it also allowed hardliners to spread such values around the world in name of Islam. Thus was born the pan-islamic ideology. Extremists among these forces were challenged or eliminated only when they challenged the ruling house of Saudis. The result is that liberal opposition is replaced by extremist pan Islamic organisations. Now the US and West is in classical catch 22 situation. They have traditionally secured their interests in the Arabian Peninsula and adjoining region through autocratic regimes. If they oppose them, their interests are jeopardized and the extremists embolden; If not, they don’t know how to convince the Saudi’s to reign in the extremists who themselves are at their wits to deal with this Frankenstein. This situation is similar in Pakistan where in place of royal family there is military-Jihadi complex. In fact this is bound to happen in all those countries where exclusivist-extremists come to rule the mainstream. So the situation exposes the players and their intentions.
In contrast Iran is progressive and more forward looking. She sees herself as a leader of the region and there are strong historical and cultural reasons behind this. This is something that gives her confidence and guts to face the West on equal terms of engagement. Nothing can be more annoying to the West than this; perhaps the reason why there is such resentment against it in the US and EU. The West needs to realize that though Nukes provide lead in armed conflict, it role and lead largely remains notional. The language and mode of the West’s engagement with ‘Middle East’ is such that any such lead will never be strong enough to force values there. The dependence on oil brings a fissure in any concerted action and if the conflict is charged by Arab non state actors, nuclear advantage will be no advantage at all. Even a Nuke capable Iran will be no different from a nuke capable France. The threat to the West is not from governments but from non state actors. And in such scenario US and EU policy instead of strengthening governments and making them more responsible is strengthening the non state pan Islamists.
Currently nowhere in the world the Western Interests are substantially challenged by Shia fundamentalists. There is no strong and continous ideological hatred towards them in Iran (a thing left for the Sunni-Wahhabi Pan Islamists). So why a progressive and more democratic Iran is seen as an enemy in the West and particularly in US, is a mystery. Can’t they see it from wider perspective? Is it the arrogance of the West that they can’t withstand any country challenge their set rules while they can condone any indirect attack by non state actors? This inability of the West to clearly identify the real threat and act accordingly is going to incur heavy cost.
The non state actors going further towards extremism and their ability to radicalize people in Europe and US brings to fore the stark reality of failure of the traditional approach to this problem.
Secondly, and more importantly the insistence of US and etc. in eliminating the hardliners needs to be taken with a pinch of salt. Though it will be important a surgical tool in limited sphere. Interventions like that in Iraq and Afghanistan would be counterproductive. The real solution would need political, social and cultural intervention and needs a person of moral and ethical conviction and power to take the lead. It would require straight and simple dialogue with the representatives across the world. And each duplicitous rule for people on basis of race, religion etc. will have to done away with. Such dialogue would not be to safeguard some interests, but to set forth rules of engagement. It would have to be different from the formats developed hitherto by people engaged in promoting interfaith dialogue. Since it scrupulously avoid the irrational and unjust culture-religion specific demands making the whole exercise a farce. Interfaith dialogue appears as a typical western response and is well exposed now.
India with its experience and tradition is best suited to start any such initiative. But this is a task on which even the Mahatma failed to deliver.
One doesn’t know if President Obama wanted to engage the Islamic world from this point. If so, I feel that the US history and engagements worldwide makes it the least probable a country to succeed with any such initiative.

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Forlorn leaf – 13

बिंदुत्व और स्पंदन
स्थैर्य और प्रवहण
बूंद और नदी
हर द्वैत के बीच अद्वय सृजन बीच होता है।
श्वेत धुंध में खोई नदी
रेतीले किनारे अलसाए झुडुप
प्रात: जब कलरव से जीवंत हो उठते हैं
वह नदी का स्वर विस्तार होता है।
बीज बूंद में
स्थैर्य प्रवहण के बीच, शुद्ध अभिज्ञान
कुश पर ठहरे ससीम जल बिंदु में
वह असीम का अंग होता है।
निज चरण बढ़ा नदी सागर बन
वृक्ष-वल्ली में बन रस संचरित हो

जड़ चेतन में प्राण होता है।
वह आकाश में नक्षत्र गति प्रेरक
निसर्ग का ऋतु चक्र
जीव का ऋतु काल
भाव और क्रिया का आकार होता है।
मेरी कामना तुम्हारी अपनी ही नहीं होती
इसीलिए तो तुम्हारी बेखुदी मुझे खींचती है
और नहीं कहतीं तुम
मेरी खोई आँखों में हमारा मिलना ज्यादा यथार्थ होता हैं
नहीं तो मैं बस नदी की धुंध होता हँू।

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