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Archive for अप्रैल, 2010

Forlorn Leaf – 21

One who rambles over rocks, sand and pristine pebbles
I am that shadow of water bubble
With nothing to rest by
Keep moving on the stream’s coir
You like the way I surprise
You love me for variety of feelings and experience
I admire energy and you conviction
Yet your wavy being sends me shivers
You ask why I am not consistent and strong
And without answer come days and nights pass
In woods every moonlit summer night
I silently wish you understand the murmurs of sand
I admire you, but to pebbles and crystals I owe my colors
To rocks my serenity and support
Can’t come out to love the way you want
Coz every move drives me in further
Love for you is a celebration
For me it is an exploration
Don’t know how these will ever reconcile
Shadow of wave and shadow of bubble?

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By the way, is this much hyped new generation of Indian politicians holds any worth? It is another fact that they are presented as hope of the country by equally worthless and stupid whores called Media. They now have become seriously frivolous. Looking at the Baba logs of various parties and more of the Indian National Corruption Party talk on the cameras- their dandy mannerism, accent and gibberish shit,’ think any gigolo could better them. One can’t help imagine what shit bagful of monies can make a whole lot of empty mind think and speak. The listening canards of their life style, business deals and then these big talks all is so puke. Is this only me who get this feel? But rot is not limited to them alone. The Tharoor- Sunanda-IPL issue taught us that urbane, suave, educated intellectual could convert to these ways even more willingly.

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Forlorn Leaf – 20

The plague
All fevering and dancing
Overpowered by self possessed living
Some weak tired and reeling
Some at those tumors wandering
Children playing more noisily
Aged ones in restive routine
Everyone as if afraid to speak
Lines of their flushed cheeks shine
Grey coat tucked with red roses
Bringing forth inebriation of strange possession
Eyes brightened, neck straightened
In deathful mourning unheard plights
The decaying history mother
Silently enjoying fate of her failing children
Readily giving away the self defeating –burden
Urban fraternity under self persecution

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Forlorn Leaf – 19

Thinking of life drabness
Of stream of unmindful dreams
I wake and close the night
Beguiled peace of illusory sights
The morn is usual
Dusky, dull without sun
But everything is in place
The flowers trees all in grace
The pale grace if death shaded
Step in a garden, enchanted
Walking over plains and mountains
Fall down by a deep recess
I feel a bird shaping inside
A new experience, every flap enshrine
Like a feather in high air
With vagaries of different layers
In the vagaries of different layers
In that high awareness
I forget the search, flying
Seems very present in a flap, I persist
I shall enter the heaven eternal
Again the man seated in the deepest abyss
Bring me down to the dreams stream

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भारत में गणतंत्र की जड़े बहुत पुरानी है। न सिर्फ वैदिक और अवैदिक क्षेत्रों में राज्य गणतंत्र आधारित थे, बाद के समय में ब्रितानी हुकूमत के आगमन तक लोगों के सामजिक जीवन पर गण या पंचायतों प्रभाव विलक्षण था।
एक भूभाग जिसमें असाधारण विविधता साथ साथ पनपती रही वहां सत्ता तंत्र का विकास यदि ऐसे गणों में हुआ था तो बाद विकसित हुए राजतंत्र भी आमजन से जुड़े रहने के लिए ऐसे गण या पंचायतों पर निर्भर थे। यह सिलसिला मुगल सल्तनत तक चलता रहा। ब्रितानी हुकूमत के साथ जब आधुनिक गणराज्य, प्रत्येक व्यक्ति से सीधे जुड़ने वाला जनतंत्र का विचार और साथ विदेशी शिक्षा, आचार-विचार और संस्थाएं विकसित होने लगी तब से पंचायतों का प्रभाव कम होता गया है। मुख्यत: इसलिए कि आधुनिक शिक्षा ने समानता को वर्ण व्यवस्था का विरोधी प्रस्थान तो माना ही है जातीय अस्मिता को भी किन्हीं अर्थो में वर्ण व्यवस्था का सहचर मानकर हेय माना है।
विषयांतर से – समस्या यह है कि इस देश में मजहब या नस्ल के आधार पर वह होमोजिनियस स्वभाव का विकास तो हुआ ही नहीं है, आधुनिक व्यक्ति का अपनी जमीन और लोगांे से जुड़ाव तो बखूबी कट गया है, गणराज्य के लिए जरूरी सीधा संबंध जोड़ने वाला कोई वैकल्पिक मूल्य आधार नहीं दिया जा सका है। आज जातिगत समाज की लोगों के जीवन मूल्यों पर प्रभाव खत्म हो गया है और ऐसे समाज उत्सव-सहभोज मनाने तक या थोड़ अधिक सजग हुए तो राजनीतिक आधार पर अपने कल्पित या यथार्थ हितों के लिए लड़ने तक सीमित हो गए हंै। लेकिन आधुनिक गणराज्य का नैतिक धरातल इतना फिसलन भरा है कि कोई एक गुर्जर-मीणा विवाद या खाप पंचायत का निर्णय पूरे राष्ट्र को थाम देने में सक्षम होता है। लंबी दासता के साथ हम न्याय बुद्धि और त्याग का भाव खो चुके है। आधुनिक डेमोक्रेसी में जाति के प्रयोग से डेमोक्रेसी ही नहीं भारत वर्ष की संस्कृति कमजोर हुई है। नागरिक चरित्र कमजोर हुआ है।
ऐसे समाज का जड़विहीन आधुनिक मानस ग्लोबलाइजेशन की ताकतों को बड़ा सहयोगी सिद्ध होता है। वह समाज में सफल उद्योगपति है, राजनीतिज्ञ है, बाबू अफसर है, तथा कथित गुरु है। जो इन सफल बर्बर विचारों के कंटीली शाखाओं को खुद को बचा लेने में ही पूर्ण पुरुषार्थ समझते हैं भले ही इसके लिए उन्हें उनका सहभागी क्यों ना बनना पड़े। समस्या की जड़ पर प्रहार करने वाले कम ही लोग है। मुख्य बात यह है कि घर से परिवार, परिवार से जाति-समूह और जाति समूह से समाज और उससे सारे विश्व के जोड़ और समस्त विनिमय की जो दृष्टि धर्म से विकसित करने की जिम्मेदारी है उसे लेकर सत्तातंत्र और समाज में कम ही लोग सजग है। दु:खद है कि वैचारिक और सत्ता स्तर पर विदेशी दासता का सिलसिला आधुनिक गणराज्य में भी चल रहा है। वह सम्यक् दृष्टि कम ही देखने को मिलती है।
प्राचीन भारत मंे काशी, कोसल, अंग, वत्स, चेदि, मल्ल, मगध, वज्जी, कुरु, पांचाल, मत्स्य, शौरसेन, अश्मक, अवंति, गांधार, कंबोज -16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। स्रोतानुसार संख्या भेद भी है जो देशकाल परिस्थिति के अनुरूप है। आरंभ में जब गणतंत्र लोक समूह या जाति के आधार पर विकसित होने लगे तो इन्हीं कुछ गणराज्यों के प्रभावशाली कुनबों में राजतंत्र का विचार भी विकसित होने लगा। जबकि कुछ गणतंत्र अधिक जनतंत्रीय सभा संचालित राज्य का बेहतर तंत्र मानते थे। शाक्य-लिच्छवि गणराज्यों में ऐसे संघर्ष के विस्तृत प्रमाण उपलब्ध है। मथुरा के वृष्णि-यादव वंश में भी हम कृष्ण के काल में इस संघर्ष को अनुभव कर सकते हैं। कंस मगध के मजबूत राजवंश के कर्णधार और अपने श्वसुर जरासंघ की तरह शौरसेन गणराज्य को एक राजतंत्र में परिवर्तित करने के लिए प्रयत्नशील है और उसके चहुंओर विरोध का मुख्य कारण भी यही है। वह बाहर के शक्तिशाली लोगों की मदद से राज्य चला रहा है और उसकी प्रजा और स्वजन ही उससे खौफ खाए हुए है। अस्तु।
ये गणराज्य गाँव की पंचायत का ही विस्तारित रूप रहे हैं। इसमें जाति समूह के वरिष्ठ लोग सामाजिक, राजनैतिक मामलों पर निर्णय लिया करते थे। गणराज्य या जनपदों का यह स्वरूप जाति आधारित था वर्ण आधारित नहीं। लेकिन चूंकि क्षेत्र में विभिन्न कार्यो में लगी अन्य जातियाँ थीं जो स्थानीय होने के साथ एक दूसरे के लिए उपयोगी थी उन्हें गणतंत्र में उनके प्रभाव के अनुरूप स्थान और महत्व प्राप्त हो जाता था। आपस में जब क्षेत्र विशेष में कोई जाति समूह मजबूत होकर बढ़ते तो ऐसे दूसरे कई जाति समूह उसके परिधि में आ जाते थे। जहां यह समन्वय ठीक से काम करता वहां गणराज्य मजबूत होता जाता अन्यथा दूसरी महत्वाकांक्षी जाति समूह विद्रोह कर देती या मजबूत राजतंत्र उनका उपयोग गणराज्य को कमजोर कर तोड़ने के लिए करते।
गणराज्यों में से ही राजतंत्र विकसित हो रहे थे। यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा एवं समूह भावना के बीच संघर्ष था। हमें सौम्य और जिम्मेदार राजतंत्र और फिर राजवंश की प्रशंसा और गणराज्य के आंतरिक फूट और विद्वेष की भावना के कई संदर्भ संस्कृत नीतियों में मिल जाते हैं। ऐसे वैविध्य भरे परिवेश में जब गणतंत्र या राजतंत्रों को सत्ताचालन के लिए लोक और राज्य नीति व्यवहार के लिए नियम संहिता की जरूरत पड़ने लगी तो श्रुति परंपरा से ज्ञानराशि वेद के संवाहक वैदिक ब्राrाण वर्ग के अनुभव का उपयोग होने लगा। लोग जिनके पास पूर्व के अनुभवों की थाती थी, आचार-विचार के स्पष्ट विधान थे और एक दृष्टि थी जो उन्हें अपने मूल क्षेत्र कुरु-पांचाल में ही नहीं सारे पूर्व में वंग और दक्षिण में केरल तक भूभाग में प्रासंगिक बनाता था, उन्हें एक मान्यता दिलाता था। अधिक दूर न जाएं तो शिवाजी को भी महाराज छत्रपति बनने के लिए गागा भट्ट में उसी वैदिक ब्राrाण की सहायता लेनी पड़ी थी। संभवत: इसी समय के सथ वर्ण व्यवस्था का प्रभाव सीमित आर्यावर्त से संपूर्ण भारतवर्ष में फैलने लगा। साथ ही वर्ण व्यवस्था में जातियों की स्थिति दृढ़ होने लगी।
जनपद सुदृढ़ राज्य बनने लगे उसमें रचने बसने वाली जातियों की का विस्तार हुआ, कर्म और प्रभाव के आधार पर उनका समाज में स्थान रूढ़ होना अवश्यंभावी था। बिना इस आधार के सामाजिक एवं सांस्कृतिक वैविध्य को सत्तातंत्र के अनुरूप नियमित करना संभव नहीं था। शायद यह ऐसा करने का सबसे कम हिंसापूर्ण मार्ग था। ये प्रक्रिया इतनी सहज और लौकिक रही कि इसके कोई प्रमाण भी नहीं मिलंेगे। प्रवाहशील समाज में परिवर्तन इसी प्रकार होते हैं। सनातन या सुदीर्घ परंपराओं में उद्भव या अंत नहीं दिखता। वहां परिवर्तन के कोई स्पष्ट प्रमाण भी नहीं होते, क्योंकि अनुभव कार्य -कारण श्रंखला को पूर्णतया मान लिया जाता है। न कोई विशिष्टता का दावा होता है और ना आरोप।
इस दौरान भारत वर्ष के भिन्न क्षेत्रों में स्थानीय सामाजिक जरूरतें वैदिक आलोक में स्मृतिबद्ध हुईं। समाज, आचार और न्याय संबंधी भारतीय समझ अनूठी है। वैदिक सनातन धर्मी श्रुति या वेद को भगवान मानता है। (नास्तिक मत जो वेदों का सर्वप्रामुख्य नहीं मानते भी सामान्यत: धर्म को मानते है। वे जो धर्म को नहीं मानते वे शिक्षा, व्याकरण, दर्शन आदि में से किसी को मानते हैं। इसीलिए तो चार्वाक भी दर्शन है। इसलिए मतों में परंपरा और एक दूसरे से अ जो संबंध है वह अटूट है। नव्य, चाहे वो चार्वाकवादी हो या नारीवादी या ऐसा कोई और, इसी संबंध से त्रस्त होते हैं। क्योंकि नव्य जिस विजातीय और आयातीत परिवेश में खुद की पहचान पाते हैं वह यहां तो है ही नहीं। द्रौपदी या सीता के चरित्र का आधुनिक नारीवादी विमर्श में छेदन वस्तुत: खुद का मजाक बन कर रह जाता है। जहां वे एक तर्क से किसी चरित्र को तोड़ आधुनिक दृष्टि से दिखाते हैं वहीं अगली जगह वह चरित्र कहीं अधिक परंपरा मे निवेशित होता है। – तो एक धरातल होता है जहां भिन्न विचारों को मानने वाले लोग समान भूमि पा लेते हैं)। सनातनी के लिए वेद सनातन शाश्वत और अपौरुषेय है एवं वैयक्तिक धार्मिक और आध्यात्मिक लक्ष्य के आधार है। व्यक्तिगत स्तर पर वह इनसे जो कुछ ग्रहण करता है वह लोक के आलोक में होता है और यही वस्तु उसे परंपरा की दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है। भारत वर्ष में न्याय की अवधारणा ऐसे महापुरुषों की स्मृतियाँ हैं, जो लोक के आचार में उस विराट सत्य या ऋत् को परिभाषित करती है। मनु, याज्ञावल्क्य, गौतम, अत्रि,से लेकर असित, देवल तक की जो प्रसिद्ध स्मृतियां हैं उनमें मतान्तर भेद देश-काल का है और वृहत्तर स्तर पर वैदिक ज्ञान के प्रति निष्ठा, आचरण और समझ के स्तर को भी परिलक्षित करता है।
स्मृति साहित्य ना सिर्फ परिवर्तनों को दर्शाता है, अधिकारी पुरुष द्वारा नई स्मृति भी गढ़ी जा सकती हैं। निरुक्तकार यास्क या व्याकरणकार पाणिनी लगभग ढ़ाई हजार साल पहले वैदिक शब्द और अर्थो के लोप पर चिंतन करते हैं। परंपरा में वेदों का भाष्य वैदिक अपनी प्रज्ञा से करते हैं। तो ऐसे वेदों को जानना और उसके अनुरूप आचरण से उत्पन्न मेधा(जिसमें व्यष्टि और समष्टि के व्यापार का आध्यात्मिक पक्ष होता है) से देशकालानुरूप स्मृति संहिता देना महापुरुषों का कार्य है। अब यह नितांत असंभव लगता है। न्याय की यह भारतीय समझ आध्यात्मिक और धार्मिक हो जाती है।
राजतंत्रों के विकास के साथ जहां एक ओर स्मृतियां रूढ़ होने लगी। शक्तिशाली और बलसंपन्न जाति समूह अपना उच्च स्थान बनाएं रखने में या उसे और उपर उठाने में सफल रहे। वही कम प्रभावशाली या कमजोर समूह पददलित होते चले गए। विदेशी आक्रांता तो देश में आते रहे हैं लेकिन मध्यकाल में इस्लाम और फिर ईसाइयत में राजनैतिक-मजहबी रूप मंे एकजुट विचार भारत पहुंचा तो भारतीय वैविध्य और बिखराव का उहापोह ऐसी समरसता और एकजुटता की सफलता के लिए एकदम मुफीद न्योता था।
धर्म के प्रवाह की दृष्टि का हस हुआ है वहीं जाति और वर्ण के प्रभाव के टूटने के साथ और व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को नियमित करने वाले कानून बनाने की शक्ति के कार्यपालिका में जाने और उसे व्याख्यायित करने का अधिकार नए सत्ता तंत्र में अदालतों के पास जाने से नि:संदेह लोक-जीवन से धर्म का आचरण कम होता चला जाएगा। धर्म के नाम पर कथा-आयोजन आदि बढ़ सकते है पर धर्म आयोजनों में नहीं मनुष्य के आचरण में जीवित रहता है और इस परिदृश्य में उसका कमजोर होना अवश्यंभावी है।
भारत में न्याय पंचायत करती आई हैं। यहाँ काजी की अदालत की तरह या कोर्ट की तरह किसी न्यायिक संस्था का अभाव रहा है। अंग्रेजों ने उनकी पारंपरिक सोच के हिसाब से एक महत्वपूर्ण मानी जाने वाली मनुस्मृति को लेकर उसे हिंदू कानून का आधार बनाया, जिसे आज तक उपयोग में लाया जा रहा है।यह आज भले ही शक्तिशाली लगे, मगर है आयातीत और विजाजीय ही, क्योंकि इनमें न्याय को लेकर जो समझ है वह जमीनी है ही नहीं। लेकिन काल के प्रभाव के साथ जो परिवर्तन हमने आत्मसात कर लिए हैं यह उन्हीं में से एक है। भले ही हमारे समाज में ब्रितानी कल्चरल होमोजिनिटी, डेमोक्रेसी में हर व्यक्ति का नागरिक की निजी भागीदारी या बाइबेलिकल कानून की परंपराएं और उन पर चलने वाली संस्थाएं न हो। क्या आश्चर्य है कि न्याय व्यवस्था भी एक उद्योग मंे परिवर्तित होती दिखती है, जिसका उद्देश्य जनता को उनकी जरूरत का न्याय न देना होकर कुछ उधार के मूल्य पिलाना हो जाता है। मूल्य जो भूमंडलीकरण के जमाने में शक्तिशालियों के हितों की रक्षा करना होते हैं। लंबे कानूनी दाँवपेचों की किसी लड़ाई में अंतोगत्वा विस्थापितों या धनहीनों को जीतते नहीं देखने को मिलता। यदि दो किसान खेती के किसी टुकड़े पर झगड़ते अदालत में पहुंचते है तो प्रबल संभावनाएं यही है कि दोनों भारी मात्रा में धन, सुख-शांति और शायद सत्य और शुचिता को खोएंगे। क्या बुरा है कि समाज या यदि जातिगत मामला हो तो जाति के लोग बैठकर मामले को सुलझा दें। अदालती आंकड़ों के अनुसार आज देश में दो -ढाई करोड़ से अधिक लंबित मामले हैं। अंदाजा लगाया जा सकता है कितने लोग इस त्रासदी को झेल रहे हैं।
बात यह है कि जब आधुनिक गणतंत्र भारत ने अपनी सत्ता की बागडोर अंग्रेजों से संभाली जिसने यह कोहिनूर के साथ मुगलों से ली थी, इस बात पर कोई निवेश नहीं किया गया कि हमारी परंपराओं से क्या लिया जा सकता है। शायद आधुनिक गणतंत्र भारत पुराने भारत वर्ष की कीमत पर किया गया एक प्रयोग भर है।
वे क्या मूल्य हैं? वह कौन सा मार्ग है जो भारत को भारत बना सकता है, यह प्रश्न है।

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वेदों का अध्ययन दुनियाभर में किया जा रहा है। लेकिन परंपरा की दृष्टि से समग्र अध्ययन किस प्रकार का हो सकता है, इसका सुंदर उदाहरण पाणिनीयशिक्षा से मिलता है।

ब्राrाण को बिना किसी प्रायोजन के छहों अंगों सहित वेद का अध्ययन करना और उसे जानना चाहिए – इस श्रुति वचन के अनुसार दस विद्याएं अध्येय होती हैं- चार वेद और छह वेदांग। उन वेदांगों में शिक्षा एक है। छन्द:शास्त्र वेद के चरण हैं, उन के बिना मन्त्रों की गति ठीक नहीं हो सकती। धर्म, गृह्य, श्रौत, और शुल्ब सूत्रों के भेद वाले कल्प को वेद के दोनों हाथ माना गया है। हाथ के अभाव में कोई कर्म सिद्ध नहीं किया जा सकता। ग्रहों-नक्षत्रों की गति को बतलाने वाले ज्योतिष को वेद का नेत्र कहा गया है, क्योंकि उस के ज्ञान के बिना कोई भी व्यक्ति वेदों में एक अन्धे के समान भटक सकता है। निरुक्त वेद का कान है, उस के जाने बिना सुना गया वेद भी न सुने के तुल्य ही है, क्योंकि निरुक्त ही वेदमन्त्रों के अर्थज्ञान का आधार है। शिक्षा वेद की नासिका है। यदि वह न हो तो वर्ण निष्पत्तिरूप गन्ध का ग्रहण भी नहीं हो सकता। व्याकरण वेद का मुख है, जिस के बिना कुछ भी कैसे कहा जा सकता है? इसलिए सांग वेद का अध्ययन कर के ही ब्रrालोक में पूजित होता है।
– पाणिनीयशिक्षा – 41 एवं 42 से
प्रस्तुत अनुवाद आचार्य बच्चूलाल अवस्थी ज्ञान के पाणिनीय शिक्षा त्रिनयनभाष्य से लिया लिया गया है। यह अनुवाद अंश स्वयं में स्पष्ट है और सीधे, सरल मार्ग से पारंपरिक समग्रता के महत्व को प्रदर्शित करता है। जब तक इस समग्रता से वैदिक परंपरा का अध्ययन नहीं किया जाता वेदों के यथोचित तात्पर्य तक पहुंचना असंभव लगता है। ईसापूर्व शायद चौथी शती की इस ग्रंथ में समग्र अध्ययन का जो गहन संकेत मिलता है वह न केवल वेदों के समझने के लिए जरूरी ज्ञान की ओर लक्षित करता है, वह उस पाश्चात्य परंपरा के ढकोसले को भी बेनकाब करता है जिसे अध्ययन के नाम पर परोसा जाता है। इस परोसे के आधार पीढ़ियां तैयार की जा चुकी है और अब परंपरा को खत्म करने का दायित्व इन हमारी पीढ़ियों को आउटसोर्स कर दिया गया है।

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Forlorn Leaf – 18

From the blue peaks
Into somber woods
Through misty rivulets and moon
Enter slowly wine clouds
The bacchanalian festivity
Dance and rejoicing
Trickling wine enterting
In the existence spirit
In the daylight comes a Shepard
His sheep like curls and wooly tan
And with him arrives a new consciousness pouring
In rains feeling running alike
For his curls, lips and down
His bodies like those trembling lilies
On sweeping showers of wind

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