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Archive for अगस्त, 2010

परम पूज्य स्वामी ओमानन्द पुरी का अग्नि विद्या पर लेख लोक अभ्युदय और नि:श्रेयस संबंधी भारतीय सोच पर सुंदर दृष्टिपात करता है। प्रस्तुत है लेख का प्रथम भाग।

वेदत्रयी विद्या अग्नि विज्ञान के संबंध में एकाग्रचित्त विचार करने और कुछ गं्रथों के सिंहालोकन करने पर यही पाया जाता है कि यह विषय अत्यन्त विषद और विस्तीर्ण है। संपूर्ण वेदों में 80 हजार मंत्र कर्मकाण्डात्मक अर्थात अग्नि विज्ञान सम्बन्धी हैं। 16 हजार उपासनात्मक हैं अर्थात भेद-अभेद, सगुण-निगरुण, साकार-निराकार एवं इष्टोपासना से सम्बन्धित हैं। केवल 4 हजार मंत्र ज्ञानात्मक हैं, जो वेदों के शिरोभाग अर्थात वेदान्त है। जिन्हें उपनिषद कहते हैं । तथा उनमें विशुद्ध ज्ञानात्मक तो तत्वमसि, अहं ब्रrास्मि आदि महावाक्य ही हैं। जो वेदान्त का सार है। विषयवस्तु अग्नि विज्ञानका सही-सही सम्पूर्ण रूप से प्रस्तुत करने में अधिक समय लगेगा। फिर नाना विधि विधाओं वाला यह विज्ञान वास्तव में उस अधिकारी जिज्ञासु को ही देने योग ्य है जो इसको प्राप्त करने के लिए शिष्य भाव से प्रस्तुत हो, नाममात्र की जिज्ञासा नहीं। बस तुम्हारे मन की शान्ति और संतुष्टि के लिए अत्यन्त संक्षेप में वर्णन करने का प्रयास करता हूँ। अस्तु।

इस जगत में प्राय: हम यही देखते हैं कि जो ज्ञान-विज्ञान जिस किसी मनुष्य का प्रयोजन सिद्ध करे तो मनुष्य उसी ज्ञान-विज्ञान का आश्रय करता है। जिस प्रकार नि:श्रेयस (मोक्ष) का जिज्ञासु एकमात्र परम पुरूषार्थ आत्मज्ञान (आत्मानुभूति-साक्षात- अपोक्षानुभूति) की कामना करता है। वह उस प्रयोजन के साधनरूप से निर्मल विवेक, दृढ़ वैराग्य तथा तीव्र मुमुक्षुत्व प्रभृतिवृत्ति का अवलम्बन करता है जिससे अविनाशी परमात्मा का ज्ञान होता है। ईश्वर दर्शन होता है। आत्मदर्शन होता है – वह आत्म विज्ञान है। वह जिज्ञासु इस प्रकार आत्मदर्शन कर कृत्यकृत्य हो जाता है। सभी दु:खों(त्रिताप) से सदैव के लिए छुटकारा पा जाता है। श्रुति का प्रमाण है – तरति शोकम् आत्मवित (छा. उप.) तथा ब्रह्म को जानकर ब्रrा ही हो जाता है। श्रुति प्रमाण है – ब्रहमवेद ब्रrौव भवति (मु. उप.)।
परन्तु जो व्यक्ति लौकिक अभ्युदय या स्वर्गादि पुरूषार्थ की कामना करता है, वह व्यक्ति उस प्रयोजन के साधनरूप से तपस्या, दान, अग्निहोत्रादि प्रभृति अग्नि विज्ञान का अवलम्बन करता है। वह कामनाओं से युक्त पुरुष अग्निहोत्रादि प्रभृति कर्म के द्वारा इस लोक और परलोक अर्थात स्वर्गादि में सुखभोग करता है। श्रुति का प्रमाण है – स्वर्गलोका अमृतžवं भजन्ति(क. उप.) अर्थात स्वर्गलोक में सुख भोगकर आनन्दित होता है। स्मृति का भी प्रमाण है- त्रैविद्या मां सोमपा: पूतपापा यज्ञैरि¦ा स्वर्गति प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्र लोकम् अश्निन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान् ।। (गीता- 9. 20)- अर्थात तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करनेवाले, सोमरस को पीने वाले, पाप रहित पुरुष मुझ को यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।
अग्नि विज्ञान कब से प्रारम्भ हुआ? इस विषय में कहते हैं – धर्मज्ञ समय: प्रमाणम् अर्थात धर्मज्ञ पुरुष का सिद्धांत प्रमाण है। इस नियम के धर्मज्ञतम अर्थात जो सभी से श्रेष्ठ ब्रrाज्ञ है, ब्रrाजी जो कुछ कहते हैं उस प्रमाणित धर्म-कर्म में अधिकारी पुरुघ को विहित कर्मो को करना चाहिए। जिसे श्रीमद्भगवदगीता भगवान श्रीकृष्ण ने अजरुन को बताया है – यथा – सहयज्ञा: प्रजासृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति:। अनेने प्रसविष्यध्वमेष व: अस्तु इष्टकामधुक ।। (गीता- 3. 10)- अर्थात प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लो इस यज्ञ के द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो। ऋग्वेद पुरुषसूक्त में भी उल्लेख है – यज्ञेन यज्ञमयजन्तदेवा स्तानि धर्मानि प्रथमान्न्यासन्। तेहनाकम्महिमान: सचन्त यत्र पूर्वे साद्धयां: सन्ति देवा:।।
यह यज्ञ किस प्रकार से हम लोगों के इष्ट की सिद्धि में सहायक होते हैं? तो इसके उत्तर में स्मृति प्रमाण है। श्रीमदभगवद् गीता के (३-11) में वर्णन है कि – इस श्रौत तथा स्मार्त यज्ञ के द्वारा इन्द्रादि देवताओं को चरू पुरोडाश आदि के द्वारा सन्तुष्ट करो। इस प्रकार वे समस्त इन्द्रादि देवता तुम लोगों को इष्ट विषय प्रदान कर संतुष्ट करें।
विधिवत अग्निहोत्रादि का फल यही है कि जो अग्निहोतृ पुरुष इन दीप्तिमान् अग्नि शिखाओं में यथा समय आहुतियाँ डालता हुआ अग्निहोत्रादि कर्म का आचरण करता है उस यजमान को ये (इसकी दी हुई आहुतियाँ) सूर्य की किरणों में होकर वहां ले जाती हैं जहाँ देवताओं का एकमात्र स्वामी इन्द्र रहता है। वे दीप्तीमती आहुतियाँ – आओ- आओ यह तुम्हारे सुकृत से प्राप्त हुआ पवित्र लोक है। इस प्रकार प्रिय वाणी से उसकी स्तुति करते हुए यजमान का अर्चन करती हुईं उसे सूर्य की रश्मियों के द्वारा स्वर्ग ले जाती हैं। वशिष्ठादि मेधावी ऋषियों ने ऋग्वेदादि मंत्रों में देखा था। वही यह सत्य है। उन्हीं कर्मो का हौत्र, आध्यर्व और औद्गात्र रूप त्रेता में अनेक प्रकार से विस्तरित हुआ। यथार्थ फल की कामना से युक्त होकर उनका आचरण करो। लोक में तुम्हारे लिए विहित अग्निहोत्रादि कर्मो के फल की प्राप्ति का यही मार्ग है।
अग्नि – अग्नि की ये सात जिह्वायें हैं – काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फु लिंगनी और विश्वरूचि देवी – ये अग्नि की लपलपाती हुई जिह्वायें हैं, जो आहुतियों को ग्रस लेती हैं। जिस समय ईंधन द्वारा सम्यक् प्रकार से अग्नि प्रदीप्त हो जाय और उसकी ज्वाला उठने लगे, उस समय दिये गये आज्य भागों के मध्य में आहुतियाँ डालें।
कृष्णयजुर्वेदीय कठोपनिषद में वर्णन आता है कि नचिकेता ने दूसरे वर से पारलौकिक सुख यानि स्वर्गलोक की प्राप्ति का साधनभूत अग्निविज्ञान मांगा। वह मृत्युदेवता यमराज से कहता है- हे मृत्युदेव! स्वर्गलोक में आपका भय नहीं रहता। वहाँ आपका वश नहीं चलता। वहाँ वृद्धावस्था से भी डर नहीं रहता। स्वर्गलोक में पुरुष भूख-प्यास दोनों को पार करके शोक से ऊपर उठकर आनन्दित होता है।
हे मृत्यो! आप स्वर्ग के साधनभूत अग्निविज्ञान को जानते है सो मुझ स्वर्गार्थी श्रद्धालु के प्रति उसका वर्णन कीजिए। मृत्युदेव यमराज कहते हैं – हे नचिकेता मैं अग्निविज्ञान का विशेषज्ञ हूँ और तेरे लिए उसका वर्णन करता हूं। तब यमराज ने लोकों के आदि कारणभूत उस अग्नि का तथा उसके चयन करने जैसी और जितनी ईंटें होती हैं एवं जिस प्रकार उसका चयन किया जाता है, उन सबका मंत्रों सहित सम्पूर्ण विधि नचिकेता के प्रति वर्णन कर दिया। फिर नचिकेता ने जैसा सुना था वैसा ही पूरा सब मृत्युदेव को सुना दिया। नचिकेता की उत्तम योग्यता को देखकर प्रसन्न प्रीति का अनुभव करते हुए अक्षुद्रबुद्धि महात्मा यमराज ने नचिकेता से कहा- हे नचिकेता! अब मैं तुझे एक वर और देता हूँ, वह यह कि मेरे द्वारा कहा हुआ यह अग्नि विज्ञान नचिकेता के ही नाम से जगत में प्रसिद्ध होगा- नचिकेताग्नि और तू इस अनेक रूपवाली माला को ग्रहण कर।
ईशावास्योपनिषद में मनुष्याभिमान रखनेवाले के लिए अग्निहोत्रादिकर्म अवश्यकरणीय कत्र्तव्य है। यथा- कुर्वन्नेवेहकर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:। एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे।। अर्थात कर्माधिकारी मानव इस लोक में अग्निहोत्रादिकर्मो को करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। इस प्रकार मनुष्यत्वाभिमान रखने वाले तुझमें शास्त्र-निषिद्ध पापादि कर्म लिप्त नहीं हो सकता। इससे भिन्न पापकर्मो से अलिप्त-असंग रहने का कोई दूसरा उपाय नहीं है।
जो यज्ञ विधिपूर्वक नहीं किया जाता उसका परिणाम नाशकारी होता है। अत: प्रत्येक अग्निहोतृ इसे अवश्य जाने। वह इस प्रकार है कि – जिस अग्निहोतृ का अग्निहोत्र दर्शपौर्णमास, चातुर्मास्य और शरदादि ऋतुओं में नवीन अन्न से किये जाने वाले आग्रयण इन कर्मो से रहित नित्य अतिथिपूजन से वर्जित यथासमय किये जाने वाले अग्निहोत्रदि और बलिवैश्यदेव से रहित अथवा अविधिपूर्वक हवन किया जाता है वह कर्म केवल परिश्रम मात्र फलवाला होने के कारण उस कर्ता की सात पीढ़ियों या सात लोकों का नाश कर देता है।
तैत्तिरीय उपनिषद में चतुर्थ अनुवाक में श्रीकाम और मेधाकाम पुरुषों के लिए जप तथा होम मंत्रों का वर्णन आता है – जिसका भावार्थ यह है कि जो प्रणव वेदों में श्रेष्ठ होने के कारण ऋषभ और संपूर्ण वाणी में व्याप्त होने के कारण सर्वरूप है तथा वेदरूप अमृत से प्रधानरूप में प्रादुभरूत हुआ है, वह ओंकार संपूर्ण कामनाओं का स्वामी होन से परमेश्वर मुझे मेधा द्वारा प्रसन्न या सबल करे। हे देव ! मैं अमृतžव के हेतुभूत ब्रrाज्ञान को धारण करनेवाला होऊं तथा मेरा शरीर योग्य हो। मेरी जिह्वा अतिशय मधुरभाषिणी हो। मैं कानों से अधिक मात्रा में श्रवण करूं। हे प्रणव, तू ब्रrा का कोश है, क्योंकि तुझमें ब्रह्म की उपलब्धि होती है और तू लौकि बुद्धि से ढका हुआ है इसलिए सामान्यबुद्धि वाले पुरुषों को तेरे तत्व का ज्ञान नहीं होता। मेरे सुने हुए आत्मविज्ञानादि की रक्षा करो- ये मंत्र मेधाकामी पुरुषों के जप के लिए है।
अब लक्ष्मीकामी पुरुषों को होम करने के लिए मंत्र बतलाते हैं- जिसका भाव इस प्रकार है- बुद्धि प्राप्ति के बाद लक्ष्मीप्राप्ति अनर्थकारी नहीं होती है। अत: हे देव!मेरे लिए लानेवाली विस्तार करने वाली लक्ष्मी वस्त्र, गौ, अन्न पान को सर्वदाशीघ्र ही लावें। बुद्धि प्राप्त कराने के बाद मेरे पास लाओ – स्वाहा। ब्रrाचारी मेरे पास आवें स्वाहा। (स्वाहान्त मंत्र होम के लिए हैं)। मैं जनता में यशस्वी होऊँ स्वाहा (यशोजनेसानि स्वाहा)। मैं अत्यन्त प्रशंसनीय और धनी पुरुषों में विशेष धनी होऊँ स्वाहा (श्रेयान् वस्यसोसानि स्वाहा)। हे भगवन ! ब्रrा के उपलब्धि स्थान होने से कोशरूप में तुझमें मैं प्रवेश कर जाऊँ स्वाहा। हे भगवन! उस अनेक शाखाभेदवाले तुझमें मैं अपने पापकर्मो का शोधन करूँ स्वाहा। जैसे लोक में जन निमAदेश की ओर जाता है और जैसे महीने संवत्सर में जाते हैं, हे धात:! उसी प्रकार मेरे पास सभी ओर से ब्रrाचारी आवें स्वाहा। तू शरणापन्नों के दु:खों की निवृत्ति के लिए आश्रय स्थान है अत: तुम मेरे प्रति प्रकाशमान होओ। मुझे पारदयुक्त लोहे के समान अपने से अभिन्न कर लो स्वाहा।
(लेख के शेष भाग अगली पोस्ट में)

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