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Archive for सितम्बर, 2010

What’s on stake in Afghanistan – I

भारतवर्ष के नाम से पुकारा जाने वाला यह जो भूभाग है वह एक अलग कालगति में चलता है। उसमें सीधा-एकरेखीय इतिहास बोध का कोई स्थान नहीं। व्यावहारिक यथार्थ है, और परा-व्यावहारिक मिथक है, विविध-स्तरीय अस्तित्व अनुभूति के आयाम है। साथ ही अनुस्यूत स्वछंदता है जहां बाहरी स्वतंत्रता का मोल नहीं, सहनशीलता की जड़ता तक पराकाष्ठा है। दो विपरित या असंबद्ध प्रतीत होने वाले प्रस्थान के जुड़ाव को जानने की सहूलियत है। अस्तित्व के स्तर पर पाया जाने वाला भेद का नितांत अभाव, जैसे बूंद, जलधारा, नदी, सागर और पर्जन्य का एकात्म – आज भी यहां भाषा, साहित्य, शास्त्र और लोक में उपलब्ध है, जिससे खंडित आधुनिकता संवाद साध सकती है। यह जो हकीकत है इसके चलते तो कम-से-कम भारतवर्ष के संदर्भ में स्वाधीनता कोई तिथि-वार से नियत होने वाली घटना नहीं। स्वातं˜योत्तर शब्द में निहित विरोधाभास को छोड़ दें फिर भी सिर्फ राजनीतिक स्वतंत्रता को इतना बड़ा दर्जा देना किस लिहाज से और कितना सम्यक है यह विचार करने की बात है, विशेषकर भारत के संदर्भ में।
भारत विरोधाभास की जमीन है। यहां जीवन अपने विविध विरोधाभासों में प्रकट होता है, फिर विरोधाभास को सहज मान्यता उपलब्ध है। बल्कि यह मान्यता हमारी पहचान का हिस्सा है, जिसे आम भारतीय अस्तित्व के स्तर पर जानता, समझता और अनुभव करता है। लेकिन चूंकि यह सरल तर्कसंगत और संकीर्ण नहीं इसे प्रकट करना आसान नहीं। संकीर्ण तर्कसंगतता की प्रबलता के इस कालखंड में इस प्रस्थान से संवाद दुष्कर भी है। फिर तर्कसंगत, सीधे-सरल कुछ संकीर्ण विचार वाली सभ्यताओं ने मानव में विकास किया है।
कुछ खुले विचार: अफगानिस्तान में दाँव पर क्या लगा है
अफगानिस्तान आज हमें भले ही दूरस्थ और असंबंद्ध लगे, जुड़ाव बहुत गहरा है। आखिर यह यूं ही नहीं है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत की उपस्थिति को इस शिद्दत से नापसंद करता है। इस्लाम की भारतवर्ष से भेंट अफगानिस्तान मंे हुई है। जिसके प्रकट ऐतिहासिक प्रभाव भले ही भूला दिए गए हो, अप्रकट प्रभाव एक अनुगूंज की तरह आज भी अपनी सामयिकता खोज रही है। कमजोर मिला लिए गए लोगों के अवचेतन के उपरी हिस्सों को हिंसा से प्रभावित किया जा सकता है। जो गहरे अवचेतन के स्तर पर स्वभाव होता है उसे जीतने का कोई तरीका नहीं। क्योंकि वह तो स्थानीय और प्राकृतिक होता है। उसे तोड़ना पानी को तोड़ने की तरह असंभव होता है, हवा को बांधने के समान होता है। इस्लामी चेतना से जिस अशांति और तैश का वातावरण निर्मित होता है उसके पीछे कहीं यही हिंसाचार तो नहीं? नितांत अनजान और सख्त नियमांे से उपजने वाली चिढ़ तो नहीं।
अफगानिस्तान में तालिबान और इस्लामी जिहादी चाहे जितने कट्टर दिखें, यह एक प्रतिक्रिया अधिक है, उसके पीछे राजनीतिक,चालें और व्यक्तिगत हित साधना ज्यादा और अन्य कुछ कम है। अफगानिस्तान की कट्टरता में इस्लामियत कम और स्थानीय कबीले और जातीय कट्टरता का अंश अधिक है।
अमेरिका या पश्चिमी मुल्क इस बात को मानना नहीं चाहते। वस्तुत: जैसा कि पहले भी कई बार कहा ही जा चुका है, कारण यह कि इस मायने में तो वे अन्यों के बनिस्बत इस्लाम के अधिक निकट है। शब्दों की जगह विचारधारा और उनके प्रभाव के लिहाज से सोचें तो अमेरिकी और पूर्ववर्ती ब्रितानी साम्राज्य इस्लामी साम्राज्य के ही उत्तराधिकारी है और कम्यूनिस्ट भी। वस्तुत: क्रूसेड और जिहाद के रूप में जो ईसाइयत और इस्लाम की भेंट हुई है उसने दोनों को दुनिया को एक समान नजरिए से देखने का अभ्यस्त बनाया है। अफगानिस्तान में भारतीय प्रभाव का पराभव और स्पेन, तुर्की मध्य यूरोप में दोनों विचारों का अनिर्णित द्वंद्व के अनुभव हमें स्थिति को देखने की एक नई दृष्टि देते हैं।
पश्चिम और अमेरिका यदि अफगानिस्तान में इस भारतीय उपस्थिति को नहीं समझ पाते तो इसमें आश्चर्य नहीं। अमेरिका खुद इस सवाल से अब रूबरू हो रहा और और पश्चिम भी। अब जब तकनीकी के कारण स्थानीय और क्षेत्रीय प्रभाव सीमित थे पश्चिम को इस्लाम से यथार्थ के धरातल पर मेलमिलाप का मौका नहीं मिला।
संकीर्ण तर्कसंगतता में एक सरलता का बोध होता है। वह उस स्वच्छंदता का विरोधी है जहां आदमी खुद खुदी के नजदीक दिखता है, क्योंकि किताबी सीमितता और कालबद्ध दृष्टि समष्टि प्रवाह में व्यष्टि के जीवंतता को नहीं समझ सकता। अफगानिस्तान मंे भारत की दृष्टि
पश्चिम की इस्लाम से मुलाकात मुख्यत: सेक्यूलरिज्म के धरातल पर हो रही है। यह सेक्यूलरिज्म राष्ट्रीय चेतना से पूरी तरह जुड़ा हुआ है। अमरीकी सेक्यूलरिज्म को अमरीकी राष्ट्र की पहचान और अवधारणा से अलग नहीं देखा जा सकता। यह विचार उनका मौलिक योगदान है। इसे पाने के लिए मजहबी ईसाइयत से लडीं गई लम्बी और सैद्धांतिक लड़ाइयों का अनुभव पश्चिम की कलेक्ट्ीव कांशसनेस में दर्ज है। उनकी पहचान का हिस्सा है। सेक्यूलरिज्म के बिना आधुनिक फ्रांस की पहचान ही खंडित हो जाती है। लिब्रल चिंतक यदि (उदाहरण के लिए कट्टरवादी इस्लाम को ही लें) किसी सैद्धांतिक रूप से ढीले-ढाले या सहनशील प्रतिक्रिया के लिए बहस करते हैं और यदि सफल हो जाते हैं तो परिणाम क्या हो सकते हैं? वह न सिर्फ फ्रांस में कट्टर ईसाइयत के प्रति भी समर्पण होगा। अंतत: वह लिब्रल और उसके द्वारा समर्थित विचार के लिए भारी नुकसानदेह होगा। अमेरिका में ग्राउंड जीरो पर मस्जिद या इस्लामिक कम्यूनिटी सेंटर की अनुमति के लिए यदि राष्ट्रपति ओबामा खुद पैरवी करते हैं तो यह लोगों के भावनात्मक या भयजनित विचार से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न इसके चलते अमरीकी राष्ट्र के विचार और पहचान का है। अमेरिका का जो विचार है उसकी सबसे बड़ी खासियत नीति और कार्य के नियोजन के लिए बेहतरीन संस्थागत ढ़ांचे का निर्माण है। ये संस्थान लोकतंत्रीय घटनाक्रम से कम ही प्रभावित होते है उनका परिचालन विशुद्ध तार्किक, नीतिगत निर्णयों पर आधारित होता है। राष्ट्रपति ओबामा का स्वपनिल संसार भले ही अमरिकी नागरिकों को सुहावना लगता हो और दुनिया भर के लोगों को एक नए युग की आशा देता हो यह लोकतांत्रिकरण उसके वैश्विक हैसियत के लिए घातक है और समकालीन वैश्विक स्थिरता के लिहाज से भी ठीक नहीं। क्या यह मेटामाफरेसिस होगा, क्योंकि विश्व के नेता की हैसियत से वह जिस दिशा में जाना चाहता है उसके बारे में उसे कोई खबर नहीं। सभ्यताओं का कलेक्ट्वि स्तर पर का जो अनुभव मानव चित्त में बस उसे गंभीरता देता है वह यहां अल्प ही है। ऐसे अनुभव के आधार निर्णय कैसे लिए जाएंगे? वह सहनशीलता कहाँ से आएगी?

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न मेरे हिसाब से है तालिबान की असफलता की क्या कीमत होगी, यानि यदि तालिबान अफगानिस्तान में सफल नहीं हो पाते तो इसके क्या परिणाम हो सकते हैं? इसका सबसे बड़ा असर यह होगा कि आंतरिक अंतर्विरोध के चलते इस्लामी राष्ट्र एक ऐसी सामाजिक और राजनीतिक अशांति के चक्रव्यूह में फंस जाएंगे जिसकी परिधि में लगभग सारा विश्व आ जाएगा।

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