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Archive for अक्टूबर, 2010

रामचरितमानस में विभीषण
– आचार्य बच्चूलाल अवस्थी ज्ञान। आचार्यजी किसी परिचय के मोहताज नहीं। लेकिन जो नव्य है उन्हें यह बताया जा सकता है कि जिन्होंने आचार्यजी को देखा है उन्होंने मूर्तिमन्त ज्ञान देखा है। उत्सुकजन आचार्यजी की रचना भारतीय दर्शन बृहद् कोश को देख सकते हैं।
आचार्यजी का यह लेख पूर्व में प्रकाशित हो चुका है। लेकिन जब यह मेरे पास आया तो आज इसे ब्लाग के माध्यम से आपके समक्ष रख रहा हूँ। लेख में त्रुटियों के लिए क्षमायाचना के साथ।

रामचरितमानस में विभीषण

रामचरितमानस में गोस्वामीजी ने रावण को मारने के लिए राम के अवतार का वर्णन किया है। वहाँ निशाचरों से विफल देवों ने भगवान की स्तुति की। स्तुति करने वालों में प्रतिनिधिरूप से ब्रrा (brahma) थे। तब भगवान् ने कहा-
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।
तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।। – मा. 1.187.1

जिस रावण को मारने के लिए भगवान् ने प्रस्तुत अवतर लिया, वह पुलस्त्यकुल में उत्पन्न हुआ था (मा. 1.176)। वहाँ पर विभीषण के विषय में इस प्रकार आया है –
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू।
भयउ बिमात्र बन्धु लघु तासू।।
नाम बिभीषन जेहि जग जाना।
बिष्नुभगत बिग्यान निधाना।।
यहाँ प्रश्न उठता है कि पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की पहली पत्नी का नाम इडविडा कहा गया है, जिस के पुत्र कुबेर थे। दूसरी स्त्री केकसी से तीन पुत्र बताए गए हैं जो राक्षस हुए। ये तीनों रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण हैं। कोई ऐसी तीसरी पत्नी का संङ्केत कहीं नहीं है कि विभीषण को रावण का सौतेला भाई कहा जाय। गोस्वामीजी को श्रीमद्भागवत के एक अंश से भ्रम हुआ जान पड़ता है। वह अंश इस प्रकार है –
पुलस्त्योह्यजनयत्पत्न्यामगस्त्यं च हविभरुवि (havirbhuvi)।
सोह्यन्यजन्मनि दहृग्निर्विश्रवाश्च महातपा:।।
तस्य यक्षपतिर्देव: कुबेरस्त्विडविडासुत:।
रावण: कुम्भकर्णश्च तथान्यस्यां विभिषण:।। – भागवत  ४.1.36-37
गीताप्रेस की प्रति से इस का भाषान्तर ही यहां लिया जा रहा है –
पुलस्त्यजी की उन की पत्नी हविभरू से महर्षि अगस्त्य और महातेजस्वी विश्रवा ये दो पुत्र हुए। इन में अगस्त्यजी दूसरे जन्म में जठराग्नि हुए। विश्रवामुनि के इडविडा के गर्भ से यक्षराज कुबेर का जन्म हुआ और उनकी दूसरी पत्नी केकसी से रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण उत्पन्न हुए।
अन्तिम श्लोक का अन्वय लेकर भी भ्रम से बचा जा सकता है –
तस्य यक्षपति: देव: कुबेर: इडविडासुत: (जात:) तथा अन्यस्यां (जायायां) रावण:, कुम्भकर्ण:, विभीषणश्च।
स्पष्ट प्रतीत होता है कि गोस्वामीजी के मानस पटल पर भागवत का – तथान्यस्यां विभिषण: घूमता रहा है। इसे अलग रख लेने पर विभीषण को ही अन्य स्त्री का पुत्र मान लिया गया जो सर्वथा भ्रान्ति है। सौतेला भाई मान लेने पर विभीषण का चरित आद्यन्त छलना से भर जाता है, अत: वाल्मीकिरामायण के अतिरिक्त पद्मपुराण एवं स्कन्धपुराण के अपेक्षित अंशों को देखना चाहिए।
ईसा की सोलहवीं शताब्दी के रजवाड़ों में सौतेले भाइयों के जो कलह और छल पाए जाते थे उन सब का विभीषण पर गोस्वामीजी ने आरोप किया है। रावण की कामवृत्ति से छोटे भाई का असन्तोष तो स्वाभाविक प्रतीत होता है परन्तु पहले से ही घर की दीवारों पर राम-राम का लिखा होना विभीषण के चरित को निम्न स्तर पर पहुंचाता है। यद्यपि गोस्वामीजी ने अन्यत्र कहा है –
जाके प्रिय न राम बैदेही
तजिये ताहि कोटि बैरी सम
जद्यपि परम सनेही।
यह तथ्य अपने स्थान पर है, परन्तु अनुज का अग्रज के प्रति छली होना, घर में रात का सन्नाटा पाकर हनुमान् से गुपचुप बात करना, सौतेलेपन को ही उजागर करता है। यदि रावण को छोड़ना ही था और रामभक्ति में लीन होना था तो पहले ही पलायन कर जाना था।
अन्यत्र रामायण या अन्य पुराणों में इस प्रकार की छद्मनीति वर्णित नहीं है। गोस्वामीजी ने कहा है –
कलप कलप हरि चरित सुहाए।
भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए।।
तो क्या गोस्वामीजी ने जो कल्पना कर ली उसे ही कल्पान्तर मान लिया जाए? ऐसा करने पर कोई कुछ भी कह सकता है और उसी में कल्पभेद का कुतर्क दिया जा सकता है।
भागवत के श्लोक को निर्थक व्याख्या देकर यदि कहा जाय कि कुबेर, रावण और कुम्भकर्ण इडविडा के ही पुत्र थे तो अनेक अनुपपत्तियां आ खड़ी होती हैं –
(१) कुबेर इडविडासुत थे यहाँ इडविडा समस्त पद में आया हुआ शब्द है, किसी अन्य के साथ उस का अन्वय हो ही नहीं सकता।
(2)  कुबेर यक्ष थे, रावण और कुम्भकर्ण को उन का ही सहोदर मानने पर वे दोनों भी यक्षजाति में आएंगे और तब विभीषण ही राक्षस बचेंगे।
(3) राक्षसजाति का समग्र इतिहास असिद्ध हो जाएगा और तब रावण भी कुबेर के समान राक्षसराज न होकर यक्षराज बन जायगा।
(4) वस्तुत: रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण सहोदर थे जिन का जन्म राक्षसकन्या केकसी (केशिनी) से हुआ था। शूर्पणखा भी केकसी से ही उत्पन्न हुई थी। इस प्रकार ये चारों मातृपक्ष से ही राक्षस थे। यदि पितृपक्ष लिया जाय तब जो कुबेर सहित पाँचों पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की सन्तान होने के कारण मुनिवंशज थे। एतदर्थ रामारण के उत्तरकाण्ड के वृत्तांन्त को लेना चाहिए।

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राक्षसवंश की कथा रामायण के ही उत्तरकाण्ड में स्पष्ट कर दी गयी है। उन्होंने तपश्चर्या  द्वारा वरदान प्राप्त कर लङ्का को अपना निवास बनाया, उस समय लङ्का राक्षसों से रहित हो गई थी। राक्षसवंश में हेति, विद्युत्केश और सुकेश बड़े बलशाली थे। ये तीनों राक्षस वहाँ लङ्का में रहते थे। इनमें सुकेश के तीन पुत्र हुए – माल्यवान्, सुमाली तथा माली। इन के साथ और बहुत से राक्षस लंङ्का में रहते थे जो देवताओं को सन्ताप दिया करते थे। भगवान् शङ्कर के परामर्श से देवों ने विष्णु से अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की। भगवान् विष्णु ने लङ्का में स्थित राक्षसों का बहुत कुछ संहार कर दिया और बचे हुए राक्षस रसातल में प्रवेश कर गए। माल्यवान् और सुमाली आदि ने भी पलायन कर के रसातल में ही अपना स्थान बनाया।
एक बार सुमाली अपनी पुत्री केकसी के साथ भारत के गोकर्ण आश्रम में आया। वहाँ विचरण करते हुए सुमाली ने पुष्पक विमान से जाते कुबेर को देखा। कुबेर को यह पुष्पक विमान ब्रrा (brahma) से वरदान में मिला था। इस के द्वारा वे पुलस्त्य के पुत्र तथा अपने पिता विश्रवा का दर्शन करने हेतु आए थे। सुमाली के मन में चिन्ता हुई कि किस प्रकार कुबेर की तुल्यता की जाय? उस राक्षस ने अपनी पुत्री केकसी से कहा कि तुम्हारी अवस्था बीत रही है। हे पुत्रि, हम चाहते हैं कि तुम विश्रवा का वरण करो जिससे तुम कुबेर के तुल्य तेजस्वी पुत्र प्राप्त करोगी। पिता के आदेश से केकसी विश्रवा के पास गई। सायंकाल का समय था, विश्रवा अग्हिोत्र कर रहे थे। विश्रवा के चरणांे (charon) में नीचे मुख किये हुए केकसी खड़ी हो गई। विश्रवा ने देखा और कारण पूछा। केकसी ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया कि आप तपस्वी हैं, स्वयं सब जान सकते हैं।
विश्रवा ने सन्ततिलाभ का प्रयोजन जान लिया और कहा कि तुम सन्ध्याकाल में आई हो और पुत्र चाहती हो। यह राक्षसीकाल है। तुम्हारे पुत्र बड़े दुर्दान्त होंगे। इस पर केकसरी ने निवेदन किया कि हे प्रभो, आप से हम ऐसे सन्तान की अपेक्षा नहीं कर सकतीं। इस पर विश्रवा ने कहा कि तुम्हारा अन्तिम पुत्र सदाचारी होगा। इस प्रकार रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण का जन्म हुआ। अन्तिम अन्तिम सन्तान होने के कारा विभीषण को सदाचारसम्पन्न होना ही था।
केकसी के तीनांे (teenon) पुत्रों ने तप करके ब्रrा (brahma)  से वर प्राप्त किया। विभीषण का ही वरदान प्रसंङ्ग प्राप्त है। ब्रrा से विभीषण ने कहा –
प्रीतेन यदि दातव्यो वरो में श्रणु सुव्रत।
परमापद्गतस्यापि धर्मे मम मतिर्भवेत्।।
अशिक्षितं च ब्रrास्त्रं (brahmastra) भगवन् प्रतिभातु में।
या या मे जायते बुद्धिर्येषु येष्वाश्रमेषु च।।
सा सा भवतु धर्मिष्ठा तं तं र्धम च पालये।
एष मे परमोदारो वर: परमको मत:।।  – वा.रा. 7.10.30-32
अर्थात् यदि प्रसन्न हो कर मुझे वर देना चाहते हैं तो सुनिये. . . भगवन्  बड़ी से बड़ी आपत्ति में पड़ने पर भी मेरी बुद्धिधर्म में ही लगी रहे, उस से विचलित न हो और बिना सीखे ही मुझे ब्रrास्त्र (brahmastra) का ज्ञान हो जाय। जिस-जिस आश्रम के विषय में मेरा जो-जो निर्णय हो, वह धर्म के अनुकूल ही हो और उस उस धर्म का मैं पालन करूँ, यही मेरे लिए सब से उत्तम और अभीष्ट वरदान है।
ऐसे प्रीतिकर वचन सुन कर प्रजापति ने विभीषण से कहा –
धर्मिष्ठस्त्वं यथा वत्स तथा चेतद् भविष्यति।
यस्माद् राक्षसयोनौ ते जातस्यामित्रनाशन।।
नाधर्मे जायते बुद्धिरमरत्वं ददामि ते। – वा.रा. 7.10.34-35
अर्थात् वत्स तुम धर्म में स्थित रहने वाले हो अत: जो कुछ चाहते हो, वह सब पूर्ण होगा। शत्रुनाशन राक्षसयोनि में उत्पन्न हो कर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्म में नहीं लगी है इस लिए मैं तुम्हें अमरत्व देता हूँ।
रावण ने पिता विश्रवा से प्रार्थना कर कुबेर को लङ्का छोड़ने के लिए कहा। कुबेर ने कैलास को यक्षों की राजधानी बनाया और लंङ्का में रावण का राज्याभिषेक हुआ तथा वहाँ पुन: राक्षस रहने लगे। रावण ने कुबेर को जीत कर पुष्पक विमान का भी अपहरण कर लिया। इस सन्दर्भ में हमें विभीषण के ही चरित का अङ्कन करना अपेक्षित है। द्रष्टव्य यह है कि विभीषण बहुत बाद में राम के शरणागत हुए परन्तु गोस्वामीजी ने बहुत पहले ही उन्हें राजनीतिक छलना का नेता बना दिया है। हनुमान् ने सीताजी की खोज करते-करते विभीषण के घर को देखा और दोनों में प्रगाढ़ मैत्री हो गई। सन्दर्भ द्रष्टव्य है –
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाई।
नव तुलसिका बृन्द तहँ देखि हरष कपिराइ।।
लंका कहाँ सज्जन कर बासा।
मन महुँ तरक करैं कपि लागा।
तेहीं समय बिभीषनु जागा।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा।
हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी।
साधु ते होइ न कारज हानी।
बिप्र रूप धरि बचन सुनाए।
सुनत विभीषन उठि तहँ आए।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई।
बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई।
मोरें हृदय प्रीति अति होई।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी।
आयहु मोहि करन बड़भागी।।
तब हनुमन्त कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।
सुनहु पवनसुत रहनि हमारी।
जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा।
करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
तामस तनु कछु साधन नाहीं।
प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता।
बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।। – रामचरितमानस 5. 5-7

विभीषण रावण की सभा में मुख्य सदस्य था, अत: वैमात्रबन्धु मानना तो अनर्गल है ही, साथ ही विभीषण को अन्य सभासदों के विरोध में वे रावण को सम्मति देते हैं। युद्धकाण्ड के नवम सर्ग में विस्तार से राम को अजय्य बताते हुए विभीषण ने कहा है-
यावत् सुघोरा महती दुर्धर्षा हरिवाहिनी।
नावस्कन्दति नो लङ्का तावत् सीता प्रदीयताम्।।
विनश्येद्धिपुरी लङ्का शूरा: सर्वे च राक्षसा:।
रामस्य दयिता पत्नी न स्वयँ यदि दीयते।। – वा. रा./युद्ध/9. 18-19
 यद्यपि रावण ने विभीषण की सम्मति नहीं मानी, क्योंकि बारहवें सर्ग में स्पष्ट हो जाता है कि सीता के प्रति रावण की आसक्ति अविचल है। इस लिए कुम्भकर्ण ने भी रावण को डाँटा था और अन्तत: राम से युद्ध करने को अपना कत्र्तव्य (kartavya) माना। विभीषण ने रावण की ओर से बोलने वाले सभासदों को भी समझाया था। रावण के सेनानायक प्रहस्त ने डाँटते हुए कहा था –
न रावणो नातिबलस्त्रिशीर्षो
न कुम्भकर्णस्य सुतो निकुम्भ:।
न चेन्द्रजिद् दाशरथिं प्रवोढुं
त्वं वा रणो शकसमं समर्थ:।। – वा.रा./युद्ध/ 14.15
यहाँ कहीं भी राम के प्रति कोई पक्षपात करके किसी प्रकार की छलना नहीं है। सीता के प्रति आसक्ति को छोड़ दिया जाय तो अन्य विषयों में विभीषण की बात रावण मानता ही था। पन्द्रहवें सर्ग में इन्द्रजित् को जब विभीषण ने फटकारा, तब रावण तटस्थ रहा।  सोलहवें सर्ग में रावण ने विभीषण को गुप्त शत्रु जैसा बताया। विभीषण ने रावण का जो त्याग किया वह भी द्रष्टव्य है –
योह्यन्यस्त्वेवंविधं ब्रूयाद् वाक्यमेतन्निशाचर।
अस्मिन् मुहूर्ते न भवेत् त्वां तु धिक् कुलपांसन।।
इत्युक्त: परुषं वाक्यं न्यायवादी विभीषण:।
उत्पपात गदापाणिश्चतुर्भि: सह राक्षसै:।। – वा. रा./युद्ध/16.16-17
रावण ने प्रकारान्तर से विभीषण को कृतघA (kritghna) बताया। इन सब बातों पर अत्यन्त खिन्न होकर रावण को पिता के तुल्य मानते हुए भी उस के अनुचित कर्मो के प्रति अपना अमर्ष व्यक्त किया और चार राक्षसों के साथ लङ्का को छोड कर चला गया। जाते आजे अन्तरिक्ष में उस ने राक्षसराज से कहा –
स त्वं भ्रान्तोह्यसि मे राजन् ब्रूहि मां यद् यदिच्छति।
ज्येष्ठो मान्य: पितृसमो न च धर्मपथे स्थित:।
इदं हि परुषं वाक्यं न क्षमाम्यग्रजस्य ते।।
सुनीतं हितकामेन वाक्यमुक्तं दशानन।
न गृöन्त्यकृतात्मान: कालस्य वशमागता:।।
सुलभा: पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिन:।
अप्रियस्य च पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:।।
बद्धं कालस्य पाशेन सर्वभूतापहारिण:।
न नश्यन्तमुपेक्षे त्वां प्रदीप्तं शरणं यथा।।
दीप्त पावकसंकाशै: शितै: काञ्चनभूषण:।
न त्वामिच्छाम्यहं द्रष्टुं रामेन निहतं शरै:।।
शूराश्च बलवन्तश्च कृतास्त्राश्च नरा रणो।
कालाभिपन्ना: सीदन्ति यथा वालुकासेतव:।।
तन्मषर्यतु यच्चोक्तं गुरुत्वाद्धितमिच्छता।
आत्मानं सर्वथा रक्ष पुरीं चेमां सराक्षसम्।।
स्वस्तितेह्यस्तु गमिष्यामि सुखी भव मया विना।। – वा.रा./युद्ध/16. 19-25
वहाँ रावण ने विभीषण को छली बताया है और विभीषण ने विवश होकर चार राक्षसों के साथ रावण को त्याग दिया है। गोस्वामीजी ने थोड़ा प्रकारान्तर करते हुए रावण द्वारा विभीषण पर लात से प्रहार करवाया है जो रावण और विभीषण के भ्रातृत्व पर अनर्थक प्रहार है फिर भी विभीषण का कथन द्रष्टव्य है –
सुमति कुमति सब कंे उस रहहीं।
नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ कुमति तहँ सम्पत्ति नाना।
जहाँ कुमति तहँ विपत्ति निदाना।।
तव उर कुमति बसी बिपरीता।
हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी।
तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीता देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।। 40 ।।
बुध पुरान श्रुति संमत बानी।
कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई।
खल तोहि निकट मृत्यु अब आई।।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा।
रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं।
भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं।।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीति।
सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीति।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा।
अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
उमा संत कइ इहइ बढ़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा।
रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ।
सबहि सुनाई कहत अस भयऊ।।
रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मैं रघुवीर सरन अब जाऊँ  देहु जनि खोरि।। – मानस/सुन्दर/ 40-41
गोस्वामीजी ने विभीषण को अत्यन्त अल्प माना है। गाँव के ठाकुर जैसे सोलहवीं शताब्दी में हुआ करते थे, वैसा ही रावण को उन्होंने समझा। परिणामस्वरूप रावण के वचन वैसे ही निम्न कोटि के प्रतीत हो रहे हैं।
रावण ने न केवल विभीषण को भागने को विवश किया अपितु लत्ताप्रहार भी किया। इस के विपरीत रामायण के युद्धकाण्ड का सोलहवाँ सर्ग द्रष्टव्य है। जिस में विभीषण को अनार्य कहा गया है। न्यायवादी विभीषण को स्वभावत: क्रोध आया और हाथ में गदा लिए हुए चार राक्षसों के साथ लङ्का का परित्याग करते हुए रावण को पितृसम कहा और यह भी बताया कि तुम्हारा परुष वाक्य मैं क्षमा नहीं कर सकता। अन्तत: विभीषण ने जो नीतिवाक्य कहा, वह आज तक लोकोक्तियों में प्रचलित है –
सुलभा: पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिन:।
अप्रियस्य च पथस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:।। – रामायण / युद्ध / 16.21
गोस्वामीजी ने वैमात्रबन्धु होने का जो भ्रम पाल रखा था, उस ने रावण को बहुत तुच्छ बनाया और विभीषण के चरित में कुछ जोड़ा नहीं।
अत्र बुधा: प्रमाणम्।
(some fonts are corrupted, I have spelled the corrected version in roman)

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अग्नि द्वारा ब्रrाचारी उपकोशल को ब्रrा का उपदेश
छान्दोग्यउपनिषद् के चतुर्थ अध्याय के दशम खण्ड में वर्णन आता है कि उपकोशल नाम से प्रसिद्ध कमल के पुत्र ने सत्यकाम जाबाल के पास ब्रrाचर्यपूर्वक निवास किया। उसने बारह वर्षो तक आचार्य गृह में अग्नियों की परिचर्या की। किन्तु आचार्य सत्यकाम जाबाल ने अन्य ब्रrाचारियों को तो स्वाध्याय कराकर समावर्तन संस्कार कर दिया, केवल उपकोशल का ही समावर्तन नहीं किया। यह देखकर आचार्य की पत्नी ने कहा – इस ब्रrाचारी ने खूब तपस्या की है, इसने अच्छी प्रकार से अग्नियों की सेवा की है, कहीं अग्नियां आपकी निन्दा न करें। इसलिए इस उपकोशल को इसकी अभीष्ट विद्या का उपदेश कीजिए। पत् नी द्वारा कहे जाने पर भी आचार्य उसे उपदेश किए बिना बारह वर्ष के लिए बाहर चल गए।
ब्रrाचारी उपकोशल ने मानसिक दु:ख के चलते अनशन करने का निश् चय किया। अग्निशाला में चुपचाप बैठे हुए ब्रrाचारी उपकोशल से गुरुपत्नी ने कहा – हे ब्रह्मचारिऩ तू भोजन कर। क्या बात है? भोजन नहीं करता? ब्रrाचारी ने कहा – इस अकृतार्थ साधारण मनुष्य में अनेक कामनाएं रहती हैं, जो अनेक दिशाओं में ले जाने वाली हैं। मैं व्याधियों से परिपूर्ण हूँ अतएव मैं भोजन नहीं करूंगा। तब ऐसा सुनकर ब्रrाचारी की सेवा से अनुकूल हुए तीनों अगि ्नयों ने करूणावश एकत्रित होकर कहा- इस तपस्वी ब्रrाचारी ने हमारी अच्छी प्रकार से सेवा की है। अत: इस श्रद्धालु ब्रrाचारी को हम ब्रहमविद्या का उपदेश करें। ऐसा निश्चयकर वे अग्नियां ब्रह्मचारी से बोली- प्राण ब्रह्म है, क ब्रrा है, ख ब्रह्म है। ब्रह्मचारी ने कहा – यह तो मैं जानता हूं कि प्राण ब्रrा है, किन्तु क और ख क्या है को मै नहीं जानता। जब अग्नियों ने कहा – निश्चय ही जो क है वही ख है और जो ख है वही क है क्यों क सुख है और वह सुख आकाशरूप होने से नित्य और व्यापक है। इस प्रकार अग्नियों ने उस ब्रrाचारी को प्राण और उसके आश्रयय आकाश का उपदेश किया।
उनमें से सबसे पहले उस ब्रrाचारी को गार्हपत्याग्नि ने शिक्षा दी- पृथ्वी, अग्नि, अन्न और आदित्य ये मेरे चार शरीर है। आदित्य में जो यह पुरुष दिखाई पड़ता है वह मैं हूं, वहीं मैं हूं। जो इस प्रकार जानने वाला इसकी साधना करता है वह पुरुष पाप कर्मोँ को नष्ट कर देता है। अग्निलोक वाला हो जाता है। पूर्ण आयु प्राप्त करता है। उज्ज्वल जीवन बिताता है और इससे संतति परंपरा मंे उत्पन्न पुरुष क्षीण नहीं होते तथा हम उसका इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।
फिर ब्रrाचारी उपकोशल को दक्षिणाग्नि ने शिक्षा दी – जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा – से चारों मेरे शरीर है। अर्थात अपने को चार प्रकार से विभक्त करके अन्वाहार्य पचनरूप से मैं स्थित हूं। उनमें से चन्द्रमा में जो पुरूष दिखाई पड़ता हे – वह मंै हूं। जो इस प्रकार जानकर इस चतुर्था विभक्त अग्नि की उपासना करता है, वह पुरुष पापकर्मो को नाशकर देता है एवं पूर्वोक्त प्रकार से फल प्राप्त करता है।
उसके बाद उस ब्रrाचारी को आह्वनीयाग्नि ने दीक्षा दी – प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत ये चारों मेरे शरीर है। उनमें से जो विद्युत में पुरुष दीख पड़ता है- वह मैं हूं, वही मैं हूं। जो इस प्रकार जानकर इस चार भाग में विभक्त अग्नि की उपासना करता है। वह पुरुष पापकर्म को नष्ट कर देता है और पूर्वोक्त प्रकार से फल प्राप्त करता है।
उन अग्नियों ने फिर एक साथ कहा- हे उपकोशल, हे सोम्य, हमने तेरे लिए यह अपनी विद्या और आत्मविद्या कही। अब इस विद्या के फल की प्राप्ति के लिए मार्ग तुझे आचार्य बतला देंगे। कालान्तर में उसके आचार्य आए और उपकोशल को फल की प्राप्ति के लिए मार्ग बताया।
यज्ञ दोष के निवारणार्थ व्याहृतियों की उपासना
प्रजापति ने लोको को उद्देश्य बनाकर इनके सार ग्रहण करने की इच्छा से ध्यान रूप तप किया। उन तपे हुए लोको में से उसने रस निकाला। पृथिवी से अग्नि रूप रस, अंतरिक्ष से वायुरूप रस तथा द्युलोक आदित्य रूप रस को निकाला। फिर भी प्रजापति ने अग्नि आदि तीन देवताओं को लक्ष्य बनाकर तप किया। उन तपे हुए देवताओं से उसने रस निकाले। अग्नि से ऋक्, वायु से यजु: और आदित्य से साम को निकाला। उसके बाद उस प्रजापति ने त्रयी विद्या को लक्ष्य में रखकर तप किया। उस तपे हुए विद्या से उसने रस निकाले। ऋग्वेद् से भू:, यजुर्वेद से भुव: और सामवेद सामवेद से स्व: इन तीनों रसों को निकाला। उस यज्ञ में यदि ऋग्वेद के सम्बन्ध से क्षति हो तो भूस्वाहा ऐसा उच्चारण कर गार्हपत्याग्नि में हवन करे। इस प्रकार वह यजमान ऋचाओं के रस से ऋक् श्रुतियों के ओज द्वारा वह यज्ञ को ऋक् सम्बन्धी विच्छेद की पूर्ति करता है और यदि यजुर्वेद के निमित्त से क्षति हो तो भुव: स्वाहा ऐसा उच्चरण कर दक्षिणाग्नि में हवन करे। इस प्रकार यजुर्वेद के रस से यजुर्वेद के ओज द्वारा यज्ञ के यजु: सम्बन्धी क्षति की पूर्ति करता है। साम श्रुतियों के निमित्त् से क्षति हो तो स्व: स्वाहा ऐसा उच्चरण कर आह्वनीयाग्नि मंे हवन करे। इस प्रकार वह सामवेद के रस से सामवेद के ओज द्वारा सामवेद सम्बन्धी यज्ञ की क्षति की पूर्ति करता है।
पंचाग्नि विद्या
छा. उप. के पंचम अध्याय में तृतीय खण्ड से लेकर दशम खण्ड के अन्तर्गत प्रश्नोत्तर के रूप में वर्णन है। विद्या को सही ढंग से समझने के लिए आद्योपान्त वर्णन जानना आवश्यकता है।
पांचालों की परिषद में श्वेतकेतु
अरुण के पौत्र श्वेतकेतु पांचाल देशवासियों की सभा में आया। उससे जीवल के पुत्र प्रवाहण ने कहा- हे कुमार क्या पिता ने तुझे शिक्षा दी है?
श्वेतकेतु ने कहा- हां भगवन।
प्रश्न 1 प्रवाहण – क्या तू जानता है कि इस लोक से ऊपर प्रजा कहां जाती है?
श्वेतकेतु – भगवन मैं उसे नहीं जानता।
प्रश्न 2 प्रवाहण – क्या तू जानता है, वे प्रजा इस लोक में कैसे लौटती हैं?
श्वेतकेतु – भगवन मैं उसे नहीं जानता।
प्रश्न 3 प्रवाहण – क्या तू जानता है कि देवयाण और पितृयाण – इन दोनों मार्गो का विलगाव कहां से होता है?
श्वेतकेतु – भगवन मैं उसे नहीं जानता।
प्रश्न 4 प्रवाहण – क्या तू जानता है कि वह पितृलोक क्यों नहीं भर जाता?
श्वेतकेतु – भगवन मैं उसे नहीं जानता।
प्रश्न 5 प्रवाहण – क्या तू जानता है कि पांच संख्यावाली आहुति के होमकर दिए जाने पर सोमघृतादि जल प्रधान इस पुरुष संज्ञा को कैसे प्राप्त होते हैं?
श्वेतकेतु – नहीं, भगवन मैं उसे नहीं जानता।
फिर भला तू – मुझे शिक्षा दी गई है या मै शिक्षित हूं , ऐसा अपने विषय में कैसे कहा? जो पुरुष मेरे इन प्रश्नों को नहीं जानता, वह विद्वत समाज में अपने को शिक्षित कैसे कह सकता है? इसके बाद प्रवाहण से त्रस्त होकर वह श्वेतकेतु अपने पिता के स्थान पर आया और कहा- आप श्रीमान ने मुझे शिक्षा दिए बिना समावर्तन संस्कार के समय कह दिया था कि मैं ने तुझे शिक्षा दे दी है। उस क्षत्रिय राजा प्रवाहण ने मुझसे पांच प्रश्न पूछे थे, उनमें से एक का भी मैं विवेचन नहीं कर सका। श्वेतकेतु के पिता ने कहा – मैं भी उन प्रश्नों के उत्तर नहीं जानता। यदि जानता होता तो समावर्तन संस्कार के समय अपने प्रिय पुत्र को क्यों नहीं बतलाता?
पिता पुत्र का राजा प्रवाहण के पास जाना
तब गौतम और श्वेतकेतु प्रवाहण के यहां आये। अपने यहां आये हुए अभ्यागत की पूजा की। दूसरे दिन प्रात:काल होते ही सभा में राजा के पहुंचने पर वह गौतम उनके पास गया। राजा ने गौतम से कहा – हे भगवन, गौतम मनुष्य सम्बन्धी ग्रामादि धन का वरदान यथेच्छ मांग लेवें। गौतम ने कहा – हे राजन यह मनुष्य संबंधी धन तुम्हारे पास ही रहे। तुमने मेरे पुत्र श्वेतकेतु के प्रति जो पांच प्रश् नरूप बात कही थी वही मुझसे कहा। तब राजा प्रवाहण धर्मसंकट में पड़ गया। राजा ने उस गौतम को आप चिरकाल तक यहां रहें (अर्थात शास्त्रोक्त विधि से उस विद्या को प्राप्त करने की इच्छा करो) ऐसी आज्ञा दी।
राजा प्रवाहण ने गौतम से कहा- हे गौतम जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है, इससे यही जान पड़ता है कि पूर्वकाल में मुझसे पहले यह पंचाग्नि विद्या ब्राrाणों के पास नहीं गयी थी। इसी से पूर्वकाल में संपूर्ण लोक में इस विद्या का शिष्यों के प्रति अनुशासन क्षत्रियों का ही होता है। अर्थात इतने समय तक यह विद्या का शिष्यों के प्रति अनुशासन क्षत्रियों का ही होता रहा है अर्थात अतने समय तक यह विद्या क्षत्रियों की परम्परा में ही आती रही है। ऐसा कहकर राजा प्रवाहण ने पंचाग्नि विद्या का उपदेश किया।
1. लोकरूपा अग्नि विज्ञान – हे गौतम यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है। उस अग्नि का अदित्य ही समिधा है क्योंकि उससे संदीप्त होने पर यह लोक देदीप्यमान होता है। आदित्य की किरणों, धूम है। दिन ज्वाला है। चन्द्रमा अंगार है क्योंकि दिन के शांत होने पर चन्द्रमा प्रकट होता है। नक्षत्रगण चिनगारियां हैं क्योंकि अग्नि से विस्फुलिंग के समान चन्द्रमा के इधर-उधर बिखरे हुए से दीखते हैं। उस इस द्युलोकरूप अग्नि में देवगण श्रद्धा सूक्ष्मजल श्रद्धा पद लक्ष्य का हवन करते हैं, उस आहुति से सोम राजा की उत्पत्ति होती है।
2. पर्जन्यारूपा अग्नि विद्या – हे गौतम वृष्टि के अभिमानी देवता विशेषरूप पर्जन्य ही अग्नि है। वायु ही समिधा है क्योंकि पर्जन्यरूप अग्नि वायु से प्रदीप्त है। बादल धूम है। बिजली ज्वाला है, वज्र अंगार है तथा गर्जन विस्फुल्लिंग है क्योंकि विस्फुलिंग और शब्द में चारों ओर फैलना रूप समानता है। इस अग्नि में देवगण राजा सोम का हवन करते हैं। उस आहुति से वृष्टि होती है। श्रद्धा नामक सूक्ष्म जल द्वितीय पर्याय में सोमरूप से परिणत हो पर्जन्य अग्नि को प्राप्त करके वृष्टिरूप में बदल जाते हैं।
3. पृथिवी रूपा अग्नि विद्या – हे गौतम पृथिवी ही अग्नि है उसका सम्वत्सर ही समिधा है क्योंकि सम्वत्सर काल से युक्त होकर पृथिवी धान्यादि की निष्पत्ति में समर्थ होती है। आकाश धूम है। तमोरूपा रात्रि ज्वाला है। दिशाएं अंगार है एवं क्षुद्र होने के कारण अवान्तर दिशाएं विस्फुलिंग है। उस इस पृथिवीरूप अग्नि में देवगण वृष्टि का हवन करते हैं। उस आहुति से यवादिरूप अन्न होता है।
4. पुरुषरूपा अग्नि विद्या – हे गौतम पुरुष ही अग्नि है। उसकी वाणी ही समिधा है क्योंकि वाणी से ही पुरुष सुशोभित होता है। प्राण धूम है। लाल होने के कारण जिह्वा ज्वाला है। प्रकाश का आश्रय होने से नेत्र के अंगार है और श्रौत्र विस्फुलिंग है। उस अग्नि में देवगण अन्न का हवन करते हैं। उस अन्नरूप आहुति से वीर्य उत्पन्न होता है।
5. हे गौतम स्त्री ही अग्नि है। उसका उपस्थ ही समिधा है। क्योंकि पुत्रादि उत्पन्न करने के लिए वह प्रदीप्त होता है। पुरुष जो उपमंत्रणा करता है वह धूम है। लाल होने के कारण योनि ज्वाला है। जो मैथुन व्यापार है वह अंगार है और जो उससे क्षुद्र सुख होता है वह विस्फुलिंग है अर्थात चिनगारियां है। उस इस योनाग्नि में देवगण वीर्य का हवन करते हैं। उस आहुति से गर्भ पुरुष उत्पन्न होता है। इस प्रकार श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न और वीर्य रूप आहुतियों के होम से क्रमश:आप ही गर्भ रूप में परिणत होता है।
पांचवी आहुति में पुरुष संज्ञा को प्राप्त आप की गति
इस प्रकार पांचवी आहुति में आप पुरुष शब्द वाचक हो जाता है। वह जरायु से वेष्टित हुआ गर्भ दश या नौ माह तक अथवता जब तक कम या अधिक समय में सर्वांग पूर्ण नहीं हो जाते तब तक माता की कुक्ष में ही शयन करने के अनन्तर पुन: उत्पन्न होता है। इस प्रकार उत्पन्न हुआ वह पूर्ण आयु जीवित रहता है, जब तक उसके प्रारब्ध क्षीण नहीं होते। प्रारब्ध क्षीण हो जाने वर वह मर जाता है। फिर कर्मवश परलोक प्रस्थान किए हुए उस जीवात्मा को अग्नि से क्रमश: उत्पन्न हुआ था।
अन्त्येष्टि संस्काररूप अन्तिम आहुति
इस मृत पुरुष को अग्नि के लिए ऋत्विकगण ले जाते हैं। उस पुरुष का प्रसिद्ध अग्नि ही होमाधिकरण अग्नि होता है, कोई कल्पित अग्नि नहीं। प्रसिद्ध समिधा ही समिधा होती है। धूम-धूम होता है। ज्वाला ज्वाला होती है। अंगार अंगार होते है। प्रसिद्ध विस्फुल्लिंग ही विस्फुलिंग होते हैं। अर्थात पूर्व के जैसे युक्त सभी कल्पित नहीं होते। उस इस अग्नि में देवगण पुरुषरूप अग्नि आहुति का हवन करते हैं। आहुति से गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक के सभी संस्कार से सम्पन्न हो जाने के कारण पुरुष अत्यन्त दीप्तिमान हो जाता है।
प्रवाहण के प्रथम प्रश्न का उत्तर –
उक्त अधिकारी गृहस्थों में जो इस प्रकार उक्त पंचाग्नि विद्या को जानते हैं औ ये जो कि अरण्य में श्रद्ध एवं तप इन दोनों की उपासना करते हैं, वे मरने के बाद अर्चिराभिमानी देवताओं को प्राप्त होते हैं। पुन: अर्चिराभिमानी देवताओं से शुक्ल पक्ष अभिमानी देवताओं से जिन छह महीनों में सूर्य उत्तरायण की ओर जाता है, उन 6 महीनों को प्राप्त होते हैं। उन 6 महीनों से सम्वत्सर को, सम्वत्सर से आदित्य को, आदित्य से चन्दमा को एवं चन्द्रमा से विद्युत को प्राप्त होते हैं। उस विद्युतलोक में एक अमानव पुरुष है, वही उन अधिकारियों को हिरण्यगर्भ लोक में ले जाता है। बस, यही देवयान मार्ग है।
प्रवाहण के द्वितीय प्रoA का उत्तर – अब जो गृहस्थ लोक (अग्निहोत्रादि वैदिक कर्मरूप ) इष्ट (वापी, कूप, तड़ागादि निर्माणरूप) पूर्त और वेदी से बाहर अधिकारी व्यक्तियों को (यथाशक्ति धन देना रूप) दत्त – इनकी उपासना करते हैं, वे धूमाभिमानी देवता को प्राप्त होत हैं। धूमाभिमानी से रात्रि के अभिमानी देव को रात्रि के अभिमानी देवों से कृष्ण पक्षाभिमानी देव से जिन 6 महीनों में सूर्य दक्षिणायन से जाता है, उन 6 महीनों को प्राप्त होता है एवं ये लोग सम्वत्सर को प्राप्त नहीं करते। दक्षिणायन के 6 महीनों से पितृलोक को, पितृलोक से आकाश को और आकाश से चन्द्रमा को प्राप्त होते हैं। यह चन्द्रमा ही ब्राrाणों का राजा सोम है। वह देवताओं का अन्न है। उस चन्द्रमा रूप सोमरस का इन्द्रादि देवता भक्षण करते हैं।
राजा प्रवाहण के तृतीय प्रश्न का उत्तर – उस चन्द्रमा लोक में वहां के उपभोग के निमित्त कर्मोँ का नाश होने तक रहकर फिर वे लोग उसी मार्ग से लौटते हैं, जिस मार्ग से वे पहले गए थे। उस समय सर्व प्रथम वे आकाश को प्राप्त होते हैं, आकाश से वायु को, वायु होकर वे धूम होते हैं और धूम होकर पुन: बादल बनते हैं। अभ्र होकर वह वर्षा करने में समर्थ मेघ होता है। मेघ होकर ऊं चे स्थानों में बरसता है। उसके बाद वे जीव इस लोक में धान, जौ, औषधि, वनस्पति, तिल और उड़द इत्यादि होकर उत्पन्न होते हैं। तत्पश्चात् यह निष्क्रमण निश्चय ही उसके लिए अत्यन्त कष्टप्रद होता है। जो जो जीव उस अन्न हो खाता है और जो वीर्य सेचन करता है, तद्रूप ही वह हो जाता है। यदि ऊध्र्वरेता, बालक, नपुंसक या वृद्ध पुरुष ने उस अन्न को खाया हो, तो वह उसके उदर में ही नष्ट हो जाता है। कदाचित वीर्य सेचन करने वालों के द्वारा खाए जाने परवह अपने कर्मो की वृत्तिका लाभ कर पाता है। अतएव अन्न रूप में आ जाने के बाद वहाँ से निकलना उसका कठिन माना गया है। उन संस्कारयुक्त जीवों में से जो अच्छे आचरण वाले होते हैं, वे शीघ्र ही उत्तमयोनि को प्राप्त होते हैं, अर्थात् वे ब्राrाण योनि, क्षत्रिय योनि या वैश्य योनि को प्राप्त होते हैं। और जो अशुभ आचरण वाले होते हैं, वे कुत्ते की योनि, सूकर या चाण्डाल योनि रूप अशुभ शरीर को प्राप्त करते है।
प्रवाहण के चतुर्थ प्रoA का उत्तर – वे पापात्मा धूम या अर्चिरादि मार्गो में से किसी भी मार्ग से नहीं जाते। वे ये बेचारे जीव छुद्र और पुन: पुन: आने जाने वाले प्राणी होते हैं। जन्मों और मरो यही तृतीय स्थान उनके लिए होता है। बस, यही कारण है सिसे स्वर्गादि परलोक भरता नहीं। अत: जन्मना मरनारूप संसारगति से विवेकशील व्यक्ति को घृणा करनी चाहिए। इस विषय में यह मंत्र है –
स्तेनो हिरण्यस्य सुरां पिबंश्य गुरोस्तल्पमावसन् ब्रrाहा चैते पतन्ति चžवारं: पंचमश्चश्चाचरंस्तैरिति।।
अर्थात् ब्राrाण का सोना चुरानेवाला, ब्राrाण होकर मदिरा पीने वाला, गुरुपत्नी से सहवास करनेवाला और ब्राrाण की हत्या करने वाला ये चारों पतित होते हैं। तथा पांचवा उनके साथ संसर्ग करने वाला भी पतित होता है।
पंचाग्नि विद्या की महिमा – जो कोई इस प्रकार पंचाग्नियों को जानता है, वह उन पतितों के साथ संसर्ग करता हुआ भी पाप से लिपायमान नहीं होता है। इसलिए वह शुद्ध पवित्र और पुण्यलोक का भागी बन जाता है।
समस्त वैश्वानर उपासना का फल और वैश्वानर का वर्णन
छा. उप. के पंचम अध्याय के अठारहवें खण्ड में वर्णन है कि व्यस्त उपासना करने वाले राजा अश्वपति ने ऋषियों से कहा – ये सभी तुम लोग इस वैश्वानर आत्मा को पृथक -पृथक सा जानकर अन्नभक्षण करते हो। जो कोई यही मैं हूं इस प्रकार अभिमान करता हुआ इस अभिामन के विषय द्युलोक से लेकर पृथ्वी पर्यन्त प्रदेश मात्र वैश्वानर आत्मा की उपासना करता है वह वैश्वानरवेत्ता सर्वात्मा होकर अन्नभक्षण करता है, अज्ञानियों के समान देहमात्र मैं अभिमान करके अन्न नहीं खाता किंतु समस्त लोकों में, सभी प्राणियों में और शरीरादि संपूर्ण आत्माओं में अन्न भक्षण करता है।
उस इस प्रकृत वैश्वानर आत्मा का मस्तक ही द्युलोक, चक्षु सूर्य है, प्राण पृथक् वत्र्मारूप वायु है। शरीर का मध्यभाग आकाश है, बस्ती ही जल है और पृथ्वी दोनों पाद हैं, वक्ष:स्थल वेदी है, लोम कुशाएं हैं, (क्योंकि वेदी में बिछे हुए दर्भ के समान वक्ष:स्थल पर बिछे हुए से दीखते हैं) हृदय गार्हपत्याग्नि है। हृदय से उत्पन्न हुआ मन अन्वाहार्यपचन अग्नि है और मुख आह्वनीयाग्नि है क्योंकि इसी में अन्न का हवन किया जा है।
भोजन में अग्नि होत्रत्व के लिए प्रथम आहुति का वर्णन
पूर्वोक्त सिद्धांत के कारण वैश्वानर उपासक का यह कत्र्तव्य है कि भोजन के समय जो अन्न पहले आवे उसका हवन करे। वह भोक्ता जो पहली आहुति देवे तो उसे प्राणाय स्वाहा ऐसा कहकर मुख मंे अन्न डाले, उससे प्राणतृप्त होता है। प्राण के तृप्त होने पर आदित्य तृप्त होता है। सूर्य के तृप्त होने से द्युलोक तृप्त होता है तथा द्युलोक के तृप्त होने पर जिस किसी के ऊपर द्युलोक और आदित्य स्वामी भाव से अधिष्ठित है, वह भी तृप्त होता है। उसे तृप्त होने पर स्वयं भोक्ता, प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रrातेज के द्वारा तृप्त होता है।
द्वितीय प्राणाहुति का वर्णन – उसके बाद जो दूसरी आहुति दे तो उसे व्यानाय स्वाहा इस मंत्र को बोलकर मुख में डाले। इस प्रकार व्यान तृप्त होता है। व्यान के तृप्त होने पर श्रौत्र तृप्त होता है। श्रौतृ के तृप्त होने पर चन्द्रमा तृप्त होता है। चन्द्रमा के तृप्त होने पर दिशाएं तृप्त होती हैं और दिशाओं के तृप्त होने पर जिस किसी के ऊपर चन्द्रमा और दिशाएं स्वामी भाव से अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है। उसकी तृप्ति के पीछे वह भोक्ता, प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज एवं ब्रrातेज से तृप्त हो जाता है।
तृतीय आहुति का वर्णन – पुन: जिस तीसरी आहुति को दे उसे अपानाय स्वाहा इस मंत्र के द्वारा मुख में डाले। इस प्रकार अपान तृप्त हो जाता है। अपान के तृप्त होते ही वाणी की तृप्ति से अग्नि की तृप्ति होती है। अग्नि के तृप्त होने से पृथिवी तृप्त होती है और पृथिवी के तृप्त होने से जिस किसी के ऊपर पृथिवी तथा अग्नि स्वामीभाव से अधिष्ठित है, वह तृप्त होता हे एवं उसकी तृप्ति के पीछे भोक्ता, प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रrातेज तृप्त होता है।
चतुर्थ आहुति का वर्णन – फिर जिस चतुर्थ आहुति को दे तो उसे समानाय स्वाहा इस मंत्र से मुख में डाले तो इससे समान तृप्त होता है। समान तृप्त होने पर मन तृप्त होता है। मन के तृप्त होने से पर्जन्य तृप्त होता है। पर्जन्य के तृप्त होने से विद्युत तृप्त होता है। विद्युत और पर्जन्य के तृप्त होने पर जिस किसी के ऊपर विद्युत और पर्जन्य अधिष्ठित है वह तृप्त होता है। इस प्रकार उसकी तृप्ति के पीछे भोक्ता, प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रrातेज तृप्त होता है।
पंचम आहुति का वर्णन – पुन: जिस पंचम आहुति को दे उसे उदानाय स्वाहा इस मंत्र से मुख में डाले, इस प्रकार उदान तृप्त होता है। उदान के तृप्त होने पर त्वगिन्द्रिय तृप्त होती है। त्वचा के तृप्त होता है तथा आकाश केतृप्त होने पर जिस किसी के ऊपर वायु और आकाश के तृप्त पर जिस किसी के ऊपर वायु और आकाश स्वामी भाव से अधिष्ठित है वह तृप्त होता है और उसकी तृप्ति के पीछे स्वयं भोक्ता, प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रrातेज तृप्त होता है।
अविद्वानों का अग्निहोत्र
वह जो कोई इस वैश्वानर विद्या को न जानता हुआ लोक प्रसिद्ध अग्निहोत्र करता है, उसका वह अग्निहोत्र वैसा ही है जैसे आहुति योग्य अंगारों को हटाकर भस्म में आहुति डाले।
विद्वानों का अग्निहोत्र
किन्तु जो इस प्रकार उस वैश्वानर विद्या को जानकर अग्निहोत्र करता है। उसका संपूर्ण लोक, संपूर्ण भूत और पूर्वोक्त संपूर्ण आत्माओं मंे हवन हो जाता है। इस विषय में यह दृष्टान्त है – जैसे सींक का अग्रभाग अग्नि में डालते ही जलकर राख हो जाता है, वैसे ही जो इस प्रकार जानता हुआ अग्निहोत्र करता है, उसके संपूर्ण पाप जलकर भस्म हो जाते हैं। वह इस प्रकार जानकर यदि चाण्डाल को उच्छिष्ट भी दे तो भी उस उपासक का वह अन्न वैश्वानर आत्मा में ही हवन किया हुआ माना जाता है। इस विषय में यह श्लोक भी है – (छा.उप. 5.24)
यथेह क्षुधिता बाला मातरं पयरुपासते। एवं सर्वाणिभूतानि अग्निहोत्र मुपासत इति। अग्निहोत्रमुपासत इति।।
अर्थात् जैसे इस लोक में क्षुधा से पीड़ित बालक सभी प्रकार से मा की उपासना करते हैं कि माता हमें कब अन्न देगी? ऐसे ही संपूर्ण प्राणी इस प्रकार जानने वाले के अग्निहोत्ररूप भोजन की उपासना करते हैं। अग्निहोत्र की उपासना करते हैं। दोबार कहने का तात्पर्य यह है कि ऐसे अग्निहोत्र की प्रशंसा की गयी है।
कर्मफल की अनित्यता
जैसे इस लोक में सेवादि कर्म से प्राप्त हुआ लोकक्षीण हो जाता है। वैसे ही अग्निहोत्रादि पुण्यकर्म से प्राप्त हुआ परलोक में पदार्थकाल पर नष्ट हो जाते हैं। जो लोग इस कर्माधिकारी मनुष्यलोक में आत्मा को और सत्य संकल्प से प्राप्त होने वाले अन्त:करण में स्थित सत्य कामनाओं को न जानकर परलोकगामी होते हैं, संपूर्ण लोकों में उनकी यथेच्छगति नहीं होती। परन्तु जो इस लोक में आत्मा को तथा सत्य कामनाओं को जानकर परलोकगामी होते हैं,उनकी सभी लोकों में यथेच्छगति होती है।
यज्ञादि में ब्रrाचर्य दृष्टि
(छा. उप. 8.6)
लोक में (परमपुरुषार्थ का साधन होने के कारण) जिसे यज्ञ कहते हैं, वह ब्रrाचर्य ही है। क्योंकि जो ज्ञानवान हैं, वे ब्रrाचर्य से ही उस ब्रrालोक को प्राप्त करते हैं। और जिसे इष्ट ऐसा करते हैं वह भी ब्रrाचर्य ही है क्योंकि ब्रह्मचर्य रूप साधन से ही पूजन या आत्मविषय एषण कर उस आत्मा को शास्त्र एवं आचार्य के उपदेशानुसार साक्षात् जान लेता है। तथा जिसे सत्त्रायण ऐसा करते हैं वह भी ब्रrाचर्य ही है, क्योंकि पूर्वोक्त (यज्ञ और इष्ट के समान) ब्रrाचर्यरूप साधन से ही सत्स्वरूप परमात्मा से अपनी रक्षा कराता है। (अत: सत्त्रायण नामवाला भी ब्रrाचर्य ही है)। और जिसे मौन ऐसा कहते हैं, वह भी ब्रrाचर्य ही है, क्योंकि ब्रrाचर्यरूप साधन से ही साध्य आत्मा को जानकर के ध्यान करता है(अत: मौन नामवाला भी वृत्ति ब्रrाचर्य ही है)। जिसे अनाशकायन अविनाशी कहते हैं, वह भी ब्रrाचर्य है क्योंकि जिस आत्मा को ब्रह्मचर्य से प्राप्त करता है, वह आत्मा नष्ट नहीं होता है। और जिसे अरण्यान ऐसा करते हैं, वह भी ब्रह्मचर्य ही है, क्योंकि इस ब्रrालोक में ब्रrाचारी पुरुष अर और ण्य नाम वाले दो समुद्रों को प्राप्त करता है। यहां ये तीसरे द्युलोक में ऐरंमदीय (हर्षोत्पादक) सरोवर हे। वहां पर सोम सवन नामवाला अश्वत्थ वृक्ष है। वहां हिरण्यगर्भ की अपराजित नामवाली पुरी है तथा ब्रrारूप प्रभु के द्वारा विशेषरूप से निर्मित स्वर्णमय मण्डप है। उस ब्रrालोक में जो ये अर और ण्य नामवाले दो समुद्र कहे गए हैं, ब्रrाचर्य द्वारा ही ये दोनों समुद्रों को प्राप्त करते हैं। उन्हीं को वह ब्रrालोक मिलता है। उनकी संपूर्ण लोकों में स्वेच्छा गति हो जाती है।
यज्ञ के ऋत्विक
होता, उत्गाता, अध्र्वयु – ये तीनों ऋत्विक भी वाणी रूप मार्ग द्वारा दूसरे मार्ग का संस्कार करते हैं।
ब्रrा – दोनों मार्गो मंे से एक मार्ग का ब्रrा नामक ऋत्विक विवेकयुक्त मन से संस्कार करता है। ब्रrा के मौन भंग होने से यज्ञ की हानि होती है और यजमान का भी नाश हो जाता है। ब्रrा के मौन धारण से यज्ञ की सिद्धि होती है। इस प्रकार सभी ऋत्विक मिलकर दोनों ही मार्गो का संस्कार करते हैं। जिससे यजमान का यज्ञ प्रतिष्ठित रहता है और यज्ञ के प्रतिष्ठित रहने पर यजमान भी प्रतिष्ठित रहता है। इस प्रकार मौन विज्ञान युक्कत ब्रrावाला वह यजमान यज्ञ करके श्रेष्ठ होता है।
विद्वान ब्रrा की विशेषता
इस संबंध में ऐसा समझना चाहिए कि जैसा लवण (क्षार) से सुवर्ण को, सुवर्ण से रजत को, रजत को रांगे से, रांगे को शीशे से, शीशे से लोहे को, लोहे से काष्ठ को या चमड़े के बन्धन से काष्ठ को जोड़ा जाता है। वैसे ही इन लोक, देवता और त्रयी विद्या के ओज से यज्ञ की क्षतिपूर्ति करते हैं। जिसमें इस प्रकार विद्वान ब्रrा होता है, वह यज्ञ निश्चय ही मानों औषधियों द्वारा सुसंस्कृत होते हैं। जहां ऐसा विद्वान होता है, वह यज्ञ उत्तरमार्ग की प्राप्ति करानेवाला होता है। इस प्रकार जाने वाले ब्रrा को लक्ष्य में रखकर ही यह गाथा प्रसिद्ध हुई है कि जहां कर्म आवृत्त होता है, वहां पर वह पहुंच जाता है और यज्ञकर्ता की सब प्रकार से रक्षा करता है। एक मौनी (मननशील) ब्रrा ही ऋत्विक है। जैसे युद्ध में घोड़ी योद्धाओं की रक्षा सब प्रकार से करती है, वैसा ही जानने वाला ब्रrा यज्ञ, यजमान और समस्त ऋत्विकों की भी रक्षा करता है। अत: इस प्रकार जानेवाले को ही ब्रrा बनावे। ऐसा न जानने वाले को ब्रrा न बनावं।
श्रीमद्भगवद्गीता में वर्णित यज्ञों के प्रकार
1. ब्रrा-यज्ञ –
ब्रrार्पणं ब्रrाहवि: ब्रrाग्नौ ब्रrाणाहुतम्।
ब्रrौव तेन गन्तव्यं ब्रrाकर्मसमाधिना ।। (4.24)
– जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्त्रुवा आदि भी ब्रrा है और हवन किए जाने वाले योग्य द्रव्य भी ब्रrा है तथा ब्रrारूप कर्ता के द्वारा ब्रrारूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रrा है। उस ब्रrाकर्म में स्थित रहनेवाले योगी द्वारा प्राप्त किए गए फल भी ब्रrा ही है।
2. 3. देवयज्ञ और ज्ञानयज्ञ
देवमेवापरे यज्ञं योगिन: पयरुपासते।
ब्राrाग्नावपरे यज्ञं यज्ञेन एव उपजुह्वति।। (4.25)
– दूसरे योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ का ही भलीभांति अनुष्ठान किया करते हैं और अन्य योगी जन परब्रrा परमात्मारूप अग्नि में अभेद दर्शन रूप (जीव ब्रrा की अभिन्नारूप दर्शन) यज्ञ के द्वारा ही आत्मरूप यज्ञ का हवन किया करते हैं। अर्थात परब्रrा परमात्मा मंे ज्ञान द्वारा एकीभाव से स्थित होना ही ब्रrारूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञका हवन करना है।
4.5. श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि, अन्य संयामाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन् विषयान् अन्ये, इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।। (4.26)
इन्द्रियसंयमरूप यज्ञ और विषय हवन रूप यज्ञ
अन्य योगी जन श्रौत्र आदि समस्त इन्द्रियों को संयमरूप अग्नियों में हवन किया करते हैं और दूसरे योगी लोग शब्द आदि समस्त विषयों को इन्द्रियरूप अग्नियों में हवन किया करते हैं।
6 अंत:करण – संयमरूप यज्ञ
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयम: योगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपते।। (4.27)

– दूसरे योगी जन इन्द्रियों की संपूर्ण क्रियाओं को और प्राणों की समस्त क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोग रूप अग्नि मंे हवन किया करते हैं अर्थात सच्चिदानन्दघन परमात्मा को सेवा अन्य किसी का न चिन्तन करना ही उन सबका हवन करना है।
7,8,9, 10, 11 द्रव्य यज्ञ, तपयज्ञ, योगयज्ञ और स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ
द्रव्ययज्ञा: तपोयज्ञा: योगयज्ञा: तथा अपरे।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञा: च यतय: संशितव्रता:।।
– कई पुरुष द्रव्य संबंधी यज्ञ करने वाले हैं कितने ही तपस्यारूप यज्ञ करनेवाले है तथा दूसरे कितने ही योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं और कितनु ही यत्नशील पुरुष स्वाध्यायरूप यज्ञ करने वाले हैं तथा कितने ही अहिंसा आदि तीक्ष व्रतों से युक्त होकर यज्ञ करते हैं।
12, 13 यज्ञरूप से चतुर्विध प्राणायाम का कथन और सब प्रकार के यज्ञ करने वालों की प्रशंसा (४-29,30)
और दूसरे कितने ही योगीजन अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं वैसे ही अन्य योगीजन प्राणवायु में अपानवायु को हवन करते है तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करने वाले प्राणायाम परायण पुरुष प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणों को प्राणों में ही हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाशकर देनेवाले और यज्ञों को जानने वाले हैं।
यज्ञ करने वालों को सनातन ब्रह्म की प्राप्ति (4-31)
भगवान श्रीकृष्ण अजरुन से कहते है – हे कुरुश्रेष्ठ यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करते हुए (यज्ञ से बचे हुए अन्न भोजन करते हुए) योगीजन सनातन परब्रrा परमात्मा को प्राप्त होते हैं और मुक्त हो जाते हैं अर्थात मोक्ष को प्राप्त करते हैं। परन्तु यज्ञ न करनेवाले पुरुष के लिए तो यह मनुष्य लोक भी सुखदायक नहीं है। फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
सभी यज्ञ क्रिया द्वारा सम्पादित होने योग्य (4-32)
इसी प्रकार और भी बहुत तरह के यज्ञ वेदों मे विस्तार से कहे गए हैं उन सबको तू मन, इन्द्रिय और शरीर की क्रिया द्वारा संपन्न होनेवाले जान। इस प्रकार तत्व से जानकर उनके अनुष्ठान द्वारा तू कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और सर्वथा मुक्त हो जाएगा।
द्रव्य यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ का श्रेष्ठत्व
हे परंतप अजरुन द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ अत्यन्त श्रेष्ठ है तथा यावन्मात्र संपूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं। और उस ज्ञान को तू तत्वदर्शियों, ज्ञानियों के पास जाकर समझ और प्राप्त कर क्योंकि उस परम ज्ञान रूपी नौका द्वारा अतिशय पापी का भी उद्धार हो जाता है। उस परमज्ञान रूप अग्नि की यही महिमा है कि वह समस्त कर्मो को भस्ममयकर देता है और पुरुष के अन्त:करण को पूर्ण पवित्र देता है जिससे परम शुद्ध अन्त:करण में आप तžवज्ञान प्रकाशित हो उठता है अर्थात वह तžवज्ञान प्राप्त कर लेता है।

जप यज्ञ भगवान की विभूति – यज्ञानाम्न्जपयज्ञ: अस्मि
श्रीमद्भगवद्गीता (10.25) में भगवान अपनी विभूतियों का संक्षेप में वर्णन करते हुए अजरुन को बतलाते हैं कि श्रौत तथा स्मार्त सभी प्रकार से यज्ञ समूहों में मैं जपरूप यज्ञ हूं।
महाभारत में भी वर्णन है –
जपस्तु सर्वधर्मेभ्य: परमो धर्म उच्यते।
अहिंसया हि भूतानाम् जपयज्ञ प्रवर्तते।।
किसी किसी श्रौत या स्मार्त यज्ञादि में पशुबलि का विधान रहने के कारण यज्ञकर्ता की हिंसादि दोष से युक्त होने की सम्भावना है, किंतु जपरूप यज्ञ में ऐसा नहीं है। जपयज्ञ हिंसादि दोषशून्य होने के कारण अत्यन्त पवित्र है, इसलिए यह सकल यज्ञों में श्रेष्ठ है।

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