Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for जनवरी, 2011

Beauty, art and dharma

सौंदर्य निसर्ग की देन है। चहुंओर खूबसूरती के रूप में अनुग्रह बरसता है। जो उसे पाने वाले को तृप्त करता है। फल-फूल, लता-पल्लव, पखेरू-कीट-पतंगे, नदी-झरने, पहाड़-खेत, चाहें जिधर देखें, सुंदरता बिखरी पड़ी है। इस सुंदरता को पी लेना, उससे जीवन को भर लेना जीवन की मूल अभीप्सा है। सुंदरता का कोई मानदंड नहीं। माँ को बच्चे में एक अलग सुंदरता दिखती है, प्रेमी को प्रेयसी में दूसरी, नितांत अनजान सवेरे पर्वत की चोटी पर सुनहली किरणों में तीसरी. . .। हर सुंदरता अपने में एक रस लिए होती है। और वह हमारे भीतर उसके भोग की कामना जागती है। कामनाएं भी अनंत होती है। झील की लहरों में खिलखिलाते चांद की तरह। पल-प्रतिपल मन में उठने वाले स्पंदन की तरह, पुलकित करने वाली। सूक्ष्म कि छोर पकड़ में नहीं आता और मजबूत इतनी कि तमाम यम-नियम के बावजूद बेकाबू चलती है। कामना छोड़ें, सुंदरता की स्मृति भी कमजोर नहीं होती। इस सबके पीछे जो बल है वह रस ही होता है। मन रूप, गंध, स्पर्श, ध्वनि और स्वाद के माध्यम उसके रस का अनुसंधान करती है। रस की अनुभूति से सिक्त मानस में जो कामना या ऐषणा का अंकुर पनपता है, वह जीवन के पल्लवन का होता है। रस की अनुभूति सृष्टिचक्र को आगे बढ़ाती है, जीव के विकास का भी वही माध्यम होती है। यही रस कला और साहित्य की लक्ष्य भी होता है। भले ही वह सबको अपने भोग बनाता हो, समय की अपनी कोई हस्ती नहीं होती। उसे पहचान रसानुभूति ही देती है। कोई सुंदर दृश्य या स्पर्श, महक, रागदारी का अंश जब हमें ठिठका जाता है, पल के भीतर एक गहरे अंतराल जी लिए होते हैं। रस में डूब जाने की आकांक्षा में ही भोग और कला का उत्स होता है। रस और कला के संबंध का यही आरंभ है। कला भोग के साथ, प्रकृति के साथ, ऋत् के साथ अपने बह सुख के मूल की ओर लौटना होता है। इसीलिए धर्म कला के बिना रह नहीं सकता। और यह इत्तेफाक नहीं की कलाओं की जड़ें सीधे धार्मिक कर्मकांड में जा मिलती हैं। क्योंकि कर्मकांड भी विराट् ब्रrांडमें छिपे धर्म का विविध संकेतों के द्वारा किया गया प्रकटीकरण होता है, जिसके माध्यम से कर्ता उस ब्रrांड से हर प्रकार से जुड़ जाता है, और अपनी कामनाओं की पूर्ति पाता है। लोक में यही कला-धर्म बनता है। प्रेय में तो सुंदरता बसती ही है, लेकिन श्रेय का सौंदर्य एक अलग दर्जे का होता है। श्रेय के सौंदर्य की कुछ झलक आत्मलीन महापुरूष, प्रकृति में या फिर कभी ध्यान की अवस्था में मिलती है। इस श्रेय के रस के अनुभव में जो अनुग्रह हो जाता है और यथार्थ श्रद्धा का जन्म होता है। यहां रसानुभूति सब दिशाओं फैले, सबमें रहने वाले आत्मतत्व की होती है। यानि कामना जब पूर्णता की हो, सांत की न होकर अनन्त की हो तब वह आध्यात्मिक ही रह जाती है। ऐसी कामना से पैदा हुई सृजनात्मकता बड़ी मौलिक होती है। वह लिखता है तो कविता बहती है, कहता है तो गीत झरते हैं। उसके अंग की स्थिति में मुद्राओं के रहस्य प्रकट होते है। वह भीतर-बाहर और परे सर्वज्ञता में जीता है।

Read Full Post »

भारतवर्ष में परिवर्तनशील प्रवाह और स्थिरता का जो नैरंतर्य है उसमें हमारे अस्तित्व और पहचान के कई पहलू हैं, जिन्हें जानना भारत को समझने या कह लें, उसे जीने के लिहाज से अपरिहार्य है। भारतवर्ष सनातन प्रवाह को मानने वाला सांस्कृतिक लोक है, खंड प्रवाह को मानने वाला नहीं। इस बारें में पूर्व की कुछ पोस्ट में विस्तार से विचार किया गया है। (देखें सनातन और खंड प्रवाह संस्कृति और भारतीय मानस – 1)
हम किन मूल्यों को परिवर्तनशील मानते हैं, कौन-सा तत्व हमारे लिए कूटस्थ है इसे लेकर हमारी परंपरा में जो परिभाषित निर्णय है वह दर्शन से आगे अध्यात्म का विषय है। आज के परिप्रेक्ष्य में विषय के रूप में ही जो समझे जा सकें, ऐसे नहीं। इसकी यथार्थ समझ साधनापरक और अनुभवजन्य है। इस कारण इस दिशा में जो नव्य प्रयत्न हुए हैं उनके परिणाम सरल और सुस्पष्ट नहीं जो कि नितांत स्वाभाविक है। आज जिस दृष्टि से हम मूल्यों को देखते हैं वह हमारी सोच का तरीका ही नहीं है। वस्तुत: आज हमे देखने और जानने में आने वाला भारत, भारतवर्ष के विचार से कुछ इतना भिन्न है कि उसकी कल्पना भी हमारे लिए आसान नहीं। भाषाई उदाहरण लें तो यह पाणिनीय संस्कृत के आधार पर वैदिक संस्कृत को जानने के प्रयत्न के जैसा है। साथ ही हमारे पास उसे समझने के जो थोड़े बहुत बचे पारंपरिक माध्यम हैं वे भी तेजी से लुप्त हो रहे हैं।
हम कलियुग में ही नहीं जी रहे। हमारा समय उसके आगे का मलेच्छ काल है जिसके संबंध में किसी प्रकार की जानकारी धर्मशास्त्रों नहीं देते। वे तो प्रागैतिहासिक कालीन दिख पड़ते हैं। किसी भी शास्त्र या पुराण को पढ़ें तो सब कुछ मिथकीय गल्प की तरह दिखता है। उन्हें पढ़ने या समझने की कुंजी को खोए भी अर्सा हो चुका है। भारतीय परंपरा को जानने के ज्यादातर प्रयास सनातन प्रवाह की सोच को खंड प्रवाह से मानदंडों पर समझने की कवायद है। विश्वविद्यालयों में हो रहे अध्ययन आयातीय पूर्वाग्रहों की मेज पर विजातीय विचारों के औजार से एक वृद्ध कृश भीमकाय जीव पर शवच्छेदन की चल रही प्रक्रियाएं भर हैं। क्या इसका कारण प्रेतपूजक संस्कृति प्रभावित अध्ययन मार्ग होना है?
परिवर्तनशील प्रवाह के लिए ऐतिहासिक कारण हैं और उसमें आंतरिक और बाहरी दोनों कारणों के जो अंतरसंबंध हैं वे परंपरा को समझने के लिए आवश्यक ही है। ताकतवर और दबंग आयातीत दृष्टि जो अपनी प्रदीर्घ परंपरा के साथ एकांतिक तरीके से देखने की आदी है, ने कुछ ऐसा ही प्रभाव हम पर भी छोड़ा है। हम एकरेखीय और विकासशील सभ्यता के विचार से बुरी तरह चिपक गए हैं। कुछ इस कदर प्रभावित है कि हम इन स्थापनाओं या प्रयुक्त शब्दावली और पूर्वाग्रहों को परखने की जहमत भी नहीं उठाते। इनके कुछ उदाहरण और परिणाम हम आगे देखेंगे।
आधुनिकता का पश्चिम से काफी गहरा नाता है और उसकी वहाँ पैठ भी गहरी है। यह उनकी अपनी वस्तु है। वे उससे पीड़ित हो तो भी उसे छोड़ने या उससे अगला सोपान निकालने का अधिकार और जिम्मेदारी पश्चिम की है। यूरोप में बहुसंस्कृतिवाद पर शुरू हुई बहस इसी दिशा में एक कदम है। अन्य जगहों पर वह आयातीत है। वे ना उसे आत्मसात कर सकते हैं या उससे आगे बढ़ सकते हैं। मध्यपूर्व मजहबी और राजनीतिक-सामाजिक विशेषताओं के चलते आधुनिकता के प्रभाव में उस तरह कभी नहीं हो पाया जिस प्रकार अफ्रीका या दक्षिण एशिया आया है, उसने आधुनिकता को अपनी शर्तो पर उठाया है। आधुनिक विचार को यथार्थ डर इसी बात से है। और दो औपनिवेशिक सत्ताओं का संघर्ष भी यहीं पर है। यदि उसे फिर मजहब के परचम तले राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक लड़ाई लड़नी पड़े तो क्षेत्रीय सत्ताओं की हार-जीत तो बाद की बात है, आधुनिकता के लिए तो ऐसा हो जाना ही अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करने वाला है। आधुनिक लिब्रल मानस के लिए यह बहुत दुखदायी है। उन्हें मानव सभ्यता की श्रेष्ठ उपलब्धियां अब हाथों से खिसकती दिखती है कि मजहब फिर वह पहचान बन रहा है जिसके आधार पर संघर्ष की इबारत लिखी जानी है यानी संघर्ष की पृष्ठभूमि सबके लिए समान होगी और यह बेहद मूलभाव से प्रेरित होगी।
इस संघर्ष में मजहब सिर्फ एक बहाना भर है, ताकतवर बहाना। वह स्तर है जो जिस पर आकर मानव के सांस्कृतिक विचार आलौकिक या परामानवीय विश्वास के साथ बंध जाते हैं जो उसे अन्यों से अलग करते हैं। यहाँ पर आइडंेटिटी घनीभूत होती है। यह बात सिर्फ किताबों और नियमावली वाले मजहबों पर ही लागू नहीं होती। धार्मिक विचार जो परंपरा और रूढ़ियों में ही विकसित हुए है, जहाँ विशद साहित्य और कर्मकांड नहीं बन पाया है वहाँ भी पहचान का माध्यम धर्म ही तो होता है। आधुनिकता ने धर्म मजहब को समग्रता में न देखकर जल्दबाजी में खारिज कर दिया है। चाहे इसके लिए मार्क्‍स सहित पश्चिमी दर्शन को कारण माने मजहब या धर्म को लेकर आधुनिकता में जो सोच है वह निहायती उथली और अगंभीर है। इसीलिए आज जब मल्टीकल्चरलिज्म के असम्यकता पर प्रoA उठता है तो इतनी असहजता पैदा होती है। क्योंकि फिर जो अन्य आधुनिक विचार भी थोथे साबित हो सकते हैं। वह मानव को जिस तर्क, नैतिकता और सामजिक चौखट में चाहता है, मानव की पहुंच उससे कहीं आगे की है। ठीक किसी संकीर्ण मजहब की तरह आधुनिक सोच (जिसमें विज्ञान सम्मिलित है ही) सत्य पर एकाधिकार और उसके वैश्विक होने का दावा करता है ।
भारत का आधुनिकता से परिचय उपनिवेशवाद से जुड़ा है। इस भूभाग के लिए यह अनुभव सुदीर्घ विजातीय विजेता आततायी विदेशी सत्ताओं का विस्तार भर था। कोई आश्चर्य नहीं आम भारतीय मानस के लिए ये सांस्कृतिक उपस्थिति कभी अपनी सांझी नहीं बन पाई है। क्योंकि राजनीतिक सत्ता तो सांस्कृतिक जीवन का विरोधी थी उसे नष्ट करने को तत्पर थीं। परंपरा में संस्कृति के नाम पर जो आगे आता था वह बुरी तरह से लुटा-नुचा शेष था।
बंटवारा तो उसकी एक छोटा झांकी थी। जो लोग इस घटना को राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य से ही देखते हैं वे सांस्कृतिक और गहरे यथार्थ से चूक जाते हैं। जो विभेद है वह आज भी उतना ही तीखा है। सत्य पर एकाधिकार का दावा किसी सापेक्ष को स्वीकार नहीं कर सकता। लेकिन चूंकि इस तरह के दावेदार ज्यादा और हावी हैं, ऐसे दावों पर प्रश्न उन्हें छू नहीं पाते। ऐसे में वैश्विकता आधारित सर्वधर्मसमन्वय तो अपने एकाधिकार के दावे को फैलाने का प्रयास बन कर रह जाती है। पुनश्च प्रश्न तो उस दावे की सत्यता का है। आज सांस्कृतिक संवाद में खरी नैतिक ताकत तथाकथित पैगन, धर्म और अन्य बहुलतावादियों के पास है, यह अलग बात है कि उन्हें इसका इल्म नहीं। आक्रमक विचारों के आगे वे सुरक्षात्मक है। लेकिन असत्य प्रभावशाली हो सकता है, बलशाली हो सकता है, और चाहे कुछ हो सकता है लेकिन सत्य तो बन नहीं सकता। और सत्य बिना नैतिक हुआ जा नहीं सकता। जिहादी फिदाइयों की ताकत या आधुनिक राष्ट्र की सैन्य शक्ति कोलेट्रल डेमेज के रूप में जो आम नागरिकों को इस कदर डराती है, वह अनैतिकता के औजारों से अपनी अंतिम स्थान तैयार कर रहे हैं। क्योंकि यहां रीआल पॉलिटिक का जो यथार्थ है वह धारक धर्म के सामने बहुत क्षुद्र है। यह एक कुशल तंत्र भर है जो समाज के एक हिस्से को मजहब, राष्ट्रीयता या राजनीतिक विचार के बल पर आत्मघाती हिंसा के लिए तैयार करता है। इस तकाजे पर अल कायदा और अमरीकी मरीन में कोई भेद ही नहीं।
दावेदारों के बीच संघर्ष की तैयारी कई स्तरों पर हो रही है। आरंभिक लाभों का पर्याप्त दोहन कर और ऊर्जा खो चुके सैन्य – आर्थिक – राजनीतिक – क्षेत्रीय गुट और विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच तादात्मय स्थापित करते थक चुकी वैश्विक संस्था संयुक्त राष्ट्र अब ओआईसी यानी आर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कांफ्रेस के रूप में नई शुरूआत देख रही है। दो पहलुओं से इसे समझने की जरूरत है। पहला यह कि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद वैश्विकता और तदनुरूप मूल्य स्थापित करने के प्रयास संयुक्त राष्ट्र के रूप में सामने आये थे। (आधुनिक वैश्विकता के संदर्भ में कुछ विचार ब्लाग पर पूर्वलिखित पोस्ट पर देखें जा सकते हैं)। परिस्थितियां कुछ ऐसी थीं कि लोकतंत्र, सार्वजनिन नैतिक मूल्य, समानता और आधुनिकता को मान्यता थी। ये सब ऐसे सत्य थे जिन्हें प्रश्नांकित करने का सवाल ही नहीं था। हर देश को इसे स्वीकार करना था। उपनिवेशों में जो नेतृत्व उभर रहा था वह भी काल के इस विचार के अनुरूप था। भले ही स्वीकारने के कारण भिन्न रहे हों। सहज है कि इनके अनुरूप देश, लोक और संस्कृतियों को ढलना था। सांस्कृतिक प्रतिरोध को तो एक बीत जाने वाले अनुभव के रूप में देखा गया होगा। लेकिन राष्ट्र भी जब आम ग्रामीणों की तरह बरतने लगे तो संयुक्त राष्ट्र एक पंचायतनुमा बनकर रह गई। सांस्कृतिक, वैचारिक प्रतिरोध तो सामने आना ही था जो अब मजहबी पहचान के आधार पर टिक रहा है। ईसाइयत में राज्य पर चर्च का एकाधिकार बीती बात थी। भले ही आधुनिक पश्चिमी राज्य मजहबी स्तर पर पर्याप्त निरपेक्ष रहे हो, लेकिन प्रच्छन्न रूप में ईसाइयत भी उसी वैश्विकता में विश्वास करती है। पश्चिम उसे न देख सके मध्यपूर्व उसे बखूबी समझता और अनुभव करता है। मुख्यधारा इस्लाम में तो उम्मा का विचार है ही। ये दावें जो हर अन्य को विरोधी के रूप में देखता है और दूसरों को भी इसी स्तर पर खुद की पहचान बनाने को बाध्य करता है।
दूसरा कि फिर यह एक पुरानी औपनिवेशिक और नई और सफल औपनिवेशिक विचार में संघर्ष भी है। इस्लामी जगत में कट्टरवाद को पनाह दी गई और सुधारवादियों को नजरअंदाज किया जाता रहा। वैसे कहने का आशय बिलकुल नहीं कि इसके लिए अमेरिका या पश्चिम जिम्मेदार है। लेकिन परिणाम सामने है कि अब मध्यपूर्व से लेकर इंडोनेशिया तक के भूभाग में आधुनिकता, मानवतावाद, समानता, लोकतंत्र जैसे विचार वैश्विकता के दावे को खो चुके हैं। और इसके स्थान पर इस्लाम और शरीयत की वैश्विक का दावा सामने आया है। ओआईसी जिस प्रकार से महजबी मानदंडों पर निर्णय कर रही है उसे देखकर तो लगता है कि संयुक्त राष्ट्र जल्द ही अपनी प्रासंगिकता खोने वाला है। क्योंकि हमने इतिहास में देखा है कि इसी प्रकार से तो समान विचार रखने वाला एक संगठित समूह, विशाल असंगठित जग को और उसके व्यवहार को प्रभावित करता है। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता का कोई महत्व नहीं रह जाता। भारत में जो लोग इसके लिए इतने लालयित दिखते हैं उनकी सोच निश्चित ही 80 के दशक के संयुक्त राष्ट्र की कार्यक्षमता से आगे नहीं बढ़ी है। उनसे ज्यादा दया के पात्र वे बहुसंख्य भारतीय है जो ऐसे दिवालिया सपने से आनंदित हो जाते हैं। जो स्थितियां पैदा हो रही है वे नए नजरिए से परिस्थितियों को देखने और समझने की मांग करती है।
यहां जरूरी सवाल होंगे – क्या ओआईसी एक उम्मा की तरह की कोई सत्ता बना पाने में सक्षम होगा? इस्लामी जगत में राष्ट्रीय, आर्थिक, नस्लीय और सांस्कृतिक और मजहबी विभेद में शेष अन्यों की क्या भूमिका होगी, यह इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा कि उम्मा की सोच हर संस्कृति और राष्ट्र को भूमिका लेने के लिए बाध्य करेगा। उदाहरण के लिए अब तक कश्मीर पर ओआईसी के प्रस्तावों को भारत कुछ असहजता और परेशानी के साथ नजरअंदाज करता रहा है। संयुक्त राष्ट्र में ओआईसी की मुखरता जहां संभवत: चीन की सहायता भी हो – तो क्या रूख अख्तियार किया जाएगा?
अन्य संस्कृतियों में पहचान और वैश्विकता को लेकर क्या रूख बनता है? वैश्विकता के इस्लामी दावे को ईसाइयत कैसे लेती है? क्या और अधिक समन्वयवादी सोच ईसाइयत प्रभावित संस्कृतियों को धार्मिक संस्कृतियों का समर्थन दिलाएगा तो उसकी अपनी पहचान को खत्म भी तो नहीं करेगा? दक्षिण भारत में ईसाइयत ने भारतीय विचार के साथ कुछ गहरे अनुभव और प्रयोग किए हैं, वह क्या बताते है? धार्मिक विचारों के मत सनातनी, जैन, बौद्ध और सिक्ख किस प्रकार आपसी समझ बनाते हैं ? उनके भीतर जो राजनीतिक विचार है वह किस प्रकार आध्यात्मिक तत्व को समाविष्ट करता है? चीन में लोकजीवन में धर्म किस समय तक राजनीति की तरह की प्रभावशाली हो जाएगा? क्या उत्तर आधुनिक और अब उत्तर-बहुसंस्कृतिवादी यूरोप खुद की किस रूप में पहचान करता है?
—-

Read Full Post »