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Archive for फ़रवरी, 2011

अन्नदान का पुण्य
एक कन्नड़ लोककथा (अनुदित कथा का स्रोत – ए के रामानुजन कन्नड़ फोकटेल्स)
किसी गांव में एक विधवा स्त्री अपने छोटे बच्चे के साथ रहती थी। पड़ोसियों के घर साफ-सफाई एवं बर्तन मांजकर गुजर बसर किया करती। आय बहुत कम ही होती, पर वह महिला दानादि करने के बाद बचे पैसे से ही अपना निर्वाह किया करती थी। यदि उसके घर कभी कोई भिक्षुक आता, तो वह अपने बच्चे के हिस्से का अन्न रखकर बचा हुआ दान कर देती थी। उसके अन्नदान की ख्याति फैलना शुरू हो गई थी। बच्च भी बड़ा होने लगा। उसे अपनी माँ पर अचरज होता था, जो पहले धन कमाने के लिए मेहनत करती और फिर उससे अन्नदान करने में संघर्ष किया करती। क्योंकि यदि वह रोजाना इतना अन्न दान में न देती तो उसकी स्थिति बेहतर हो जाती। वह थोड़ी-बहुत धनवान हो सकती थी।
एक दिन उसने पूछा – माँ तुम ऐसा क्यों करती हो? तुम जो कमाकर लाती हो उसे दान कर देती हो। इस प्रकार के अन्न दान करने का क्या लाभ होता है?
माँ ने कहा – सब दानों में अन्नदान सर्वश्रेष्ठ है। अमीरी और गरीबी तो दिन और रात की तरह है। आते और चले जाते है। पर यदि कोई गरीबों को यथासंभव दान करता है तो उसका पुण्य उसके साथ चलते हैं। अर्जित किया पुण्य कमाए हुए धन से श्रेष्ठ होता है।
पुत्र ने पूछा – अन्नदान का क्या पुण्य होता है? तुम जो अन्नदान करती हो उससे मिलने वाले पुण्य का पैमाना क्या है?
माँ ने कहा – मैं अज्ञानी अनपढ़ स्त्री भला अन्नदान के पुण्य के बारे में क्या बता सकती हूं, तेरे इस सवाल का जवाब तो महादेव ही दे सकते हैं, तुम जाओ और उनसे पूछो?
पुत्र बोला – ठीक है माँ मैं महादेव से ही यह जानूंगा। मुझे आशीर्वाद दो, मैं जाता हूं। ऐसा कहते वह लड़का घर से निकल पड़ा।
वह चलता गया। गाँव से दूर पहाड़, घाटियां पार कर वह घने जंगल में जा पहुंचा। रात होने को आई। हिंस्र पशुओं की आवाजें आ रहीं थीं। अंधेरे में कुछ सूझता न था। तभी उसे वहां एक शिकारी दिखा। लड़के की हालत देख उसे दया आई। वह उसे अपने घर ले गया।
शिकारी बोला – रात को शेर-चीते और कई जानवर बाहर निकलते हैं। तुम रात मेरे घर ठहरो, सुबह अपनी राह पकड़ लेना। लड़का तो मानों इसी की प्रतीक्षा कर रहा था। शिकारी ने अपनी पत्नी से कहा- अपने खाने में से थोड़ा दूध और फल इस लड़के को दे दो, बेचारा भूखा-प्यासा है।
पत्नी बोली- मैं इसे अपने खाने में से कुछ नहीं दूंगी। तुम्हें देना हो तो अपने हिस्से में से दे दो।
शिकारी ने अपने हिस्से का खाना लड़के को दे दिया। झोपड़ी बहुत छोटी थी। घर के भीतर स्त्री और उस लड़के को सुलाकर वह दरवाजे में सो गया। रात को उधर से एक शेर निकला। भूखे शेर ने शिकारी को खा लिया और फिर झोपड़ी में घुसा। भूखे शेर ने शिकारी की पत्नी को भी खा लिया। इसमें उसका पेट भर गया और वह चला गया। सुबह जब वह युवक उठा ता दृश्य देखकर विचलित हो गया। वह अपने आश्रयदाता की मौत के लिए खुद को जिम्मेदार ठहरा वह फूट-फूट कर रोने लगा। रो लेने के बाद उसने किसी तरह उनके बचे अवशेषों को समेटकर गाड़ दिया।
वह आगे बढ़ा। रास्ते में उसे एक राजा बैठा हुआ दिखा। नवयुवक को देख उसने पूछा – तुम कहा जा रहे हो? उसने जवाब दिया – मैं महादेव के पास अपने सवाल का उत्तर पाने के लिए जा रहा हूँ। राजा बोला – अगर तुम जा ही रहे हो तो मेरा भी एक सवाल है, क्या तुम उसका जवाब भी पूछोगे? नवयुवक ने कहा – जी हां, आप बताएं? राजा बोला – मेरे राज्य में दुष्काल है और मैं यह तालाब खुदवा रहा हूं पर इतना खोदने के बावजूद भी इसमें पानी नहीं लग रहा, इसका क्या कारण हैं?
नवयुवक हामी भरकर आगे बढ़ा। आगे जाने पर उसे एक ब्राrाण दिखा जिसके पाँव बेकार हो चुके थे। उसने पूछा – नवयुवक तुम कहा जा रहे हो? नवयुवक ने बात दोहरा दी। ब्राम्हण बोला – क्या तुम परमेश्वर से मेरे पैरों की दुर्गति का कारण पूछोगे? हां – बोलते हुए वह युवक आगे बढ़ चला। और आगे बढ़ने पर उसे बिल से आधा बाहर निकला एक विशाल नाग दिखा। नाग ने पूछा – तुम कहां जा रहे हो? नवयुवक ने कहा- मैं परमेश्वर से अपने सवाल का जवाब जानने के लिए जा रहा हूं। नाग बोला – क्या तुम मेरा एक सवाल पूछोगे? नवयुवक ने हामी में गर्दन हिलाई। नाग बोला – मैं मेरे इस बिल में वर्षो से आधा फंसा हुआ हूँ इसका क्या कारण है? नवयुवक सवाल याद रख आगे बढ़ चला।
लम्बी यात्रा के बाद वह कैलाश पहुंचा जहां शिव पार्वती के साथ बैठे हुए थे। उसने भगवान् महादेव को प्रणाम किया। शिवजी बोले – तुम राजा चंद्रकांत के घर जाओ। उसकी रानी गर्भवती है। तुम उसे यह फल देना। उसका पुत्र तुम्हारे सवाल का जवाब देगा। नवयुवक प्रसन्न हो उठा। उसने हाथ जोड़कर कहा – भगवन् मेरे सवाल का उत्तर मुझे मिल जाएगा। लेकिन मेरे पास आपके लिए तीन और सवाल है जो मुझे रास्ते में लोगों ने आपसे उत्तर पाने के लिए कहे थे। शिवजी मुस्कुराए बोले – राजा की कन्या विवाह के वय की हो चुकी है जब वे उसका कन्यादान कर देगें तालाब में पानी लग जाएगा। वृद्ध ब्राम्हण के पास विद्याओं का भंडार है जबतक वह उसका किसी सुपात्र को दान नहीं करेगा, उसके पैर ठीक नहीं होंगे। नाग के सिर पर मणि है यदि वह उसका दान कर दे तो वह उस परिस्थिति से निकल सकेगा। नवयुवक साष्टांग दण्डवत् कर वापस लौट आया। रास्तें में उसे नाग ने रोका और सवाल दोहराया। नवयुवक ने महादेव के वचन सुना दिए। नाग प्रसन्न हुआ और उस नवयुवक को पास बुलाकर उसे मणि दे दी। नाग से अनुमति लेकर वह आगे बढ़ा। ब्राम्हण नवयुवक को आता देख बहुत खुश हुआ बोला – क्या कारण बताया महादेव ने मेरे पैरों की दुर्गति का? वह बोला – आपके पास विद्याएं है यदि आप किसी सुपात्र को उसका दान करें तो आपके पैर ठीक हो जाएंगे। ब्राम्हण ने कुछ सोचा और नवयुवक से दोनों हाथ अंजली बनाकर नीचे रखने को कहा। ब्राम्हण ने कुछ मंत्र बुदबुदाए और जल के साथ 64 विद्याएं नवयुवक को दान कर दी। ब्राम्हण के पैरों में ताकत फिर लौट आई। विद्याओं के प्रकाश से दमकता नवयुवक राजा के पास पहुंचा। राजा से कहा दिया – राजन् आपकी विवाह के लायक कन्या है जिसका आपने अब तक विवाह नहीं किया है जब आप उसका विवाह कर देंगे तालाब में पानी लग जाएगा। राजा ने कुछ सोचा और नवयुवक राजधानी में आमंत्रित किया। वहां उसके साथ उसने अपनी कन्या का विवाह रचा दिया। नवयुवक बहुत खुश हुआ। वह बोला मुझे अपने सवाल का जवाब पाना है और वह शिवजी का दिया फल लेकर राजा चंद्रमोहन के राज्य की ओर चल पड़ा। महारानी प्रसव पीड़ा में थी। नवयुवक ने राजा को अपना परिचय दे कहानी सुनाई और फल महारानी के लिए भिजवाया। फल पाते ही महारानी ने लड़के को जन्म दिया। अनुमति लेकर नवयुवक भीतर गया और बालक को गोद में लेकर बोला – हे बालक मैं भगवान महादेव की आज्ञा से तुम्हारे पास जानने आया हूँ, बताओ कि अन्नदान का क्या पुण्य होता है?
नवजात बालक हँसा और उसके हँसी से दिशाएं गूंज उठी। वह मेघ गंभीर स्वर में बोला – तुम अब भी मुझसे अन्नदान का पुण्य पूछते हो? क्या तुम्हें वन में बिताई वह रात याद है जब एक शिकारी के घर तुमने रात बिताई थी? आश्चर्यचकित नवयुवक ने कहा – हाँ, और उस शिकारी ने मुझे अपना भोजन और आश्रय दिया था। लेकिन एक दुर्दात सिंह ने रात को उसे अपना ग्रास बना लिया था।
बालक खिलखिलाकर हँसते हुए बोला पूर्वजीवन में वह शिकारी मैं था।

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Nothing is ‘Rootless”


बुधवार, स्वामी विवेकानन्द जन्मतिथि। उज्जैन में गिरीश जी से भेट हुई। उन्होंने जो बात कही वह दिल को छू गई। बात एलिनिएशन और रूटलेसनेस पर थी। चर्चा का ऐसा विषय, उस पर एक ऐसे व्यक्ति के विचार जिनकी भारतीय परंपरा की समझ कुछ चमत्कृत सा कर देती है, मेरे लिए रोचक होने ही थे।
पर उन्होंने जो बात कहीं उसके लिए मैं तैयार न था। वह मेरे लिए केवल नई दृष्टि भर नहीं थी। मेरी समझ की एक भारी चूक सामने लाकर एक विश्वास देने वाली भी थीं वे। (वैसे अक्सर अपने मित्रों को यह कहते कल्पना करता हँू कि मैं एक नकारात्मकता से सोचता हँू। यहाँ मुझे कुछ सकारात्मकता दिखी है, सो मिली खुशी यहाँ सारांश में आपके समक्ष रख रहा हँू . . .)

गिरीश जी से बात भारतीयों के जीवन से भारतीय परंपरा और उसके मूल्यों के हो रहे अलगाव पर हो रही थी। बातें जो हम सबकों कुरेदती है। जिन्हें हम बदलते समय पर थोप कर चुप हो जाते हैं।
मैं शायद कुछ यह कह रहा था कि जो आधुनिक जीवन में शिक्षा में हमने जो मूल्य अपनाएं हैं वे भारतीय नहीं है। विजातीय है, गड्डमड्ड है। बाजार की लोक-संस्कृति इस गुण और मूल्य के क्षरण को नए जुमलों के साथ महीमामंडित करती है। लेकिन पुरानी और नई पीढ़ीं में एक संवादहीनता फैल रही है। जो खतरनाक है। मैंने नई पीढ़ी के लिए जड़विहीन (रूटलेस) शब्द का उपयोग किया था।
गिरीशजी का उत्तर था – कोई रूटलेस नहीं होता। क्योंकि पोषण के लिए जड़ों की आवश्यकता होती ही है। जड़ें कमजोर हो सकती हैं, संकुचित हो सकती हैं, रूग्ण हो सकती हैं, लेकिन अस्तित्व जड़विहीन नहीं होता। मनुष्य को पोषण की जरूरत होती है और वह जड़ बिना नहीं रह सकता। पोषण तो हमें जड़ों से ही मिलता है।
लेकिन लोकप्रिय-प्रभावशाली और घनघोर प्रसार पाती जो जीवनशैली हमें दिख पड़ रही है, उनका उस पोषण से कोई लेना-देना नहीं जो हमें परंपरा से जोड़ता है। हम खुद को किसी भिन्न नाम रूप से पहचानें, हमारा यथार्थ अस्तित्व बिलकुल अलग है। परंपरा की दृष्टि से कहें तो हमारा मूल अस्तित्व धर्म-अध्यात्म, या अभ्युदय-नि:श्रेयस के जिस आचरण पर आधारित है वह आचरण ही भारतीय परंपरा की दृष्टि है। इसी में हमारा परंपरा से और परंपरा का सनातनता से संबंध है। बात जँची। उज्जैन जाते समय ट्रेन में पढ़े ए. के. रामानुजन के निबंध का यहां स्मरण हो रहा है। आपके समक्ष निबंध का एक अंर्तदृष्टिपूर्ण अंश प्रस्तुत है:
I would suggest the obvious that cultural traditions in India are indissolubly plural and often conflicting but are organized by at least two principles, (a) context-sensitivity and (b) reflexivity of various sorts. What we call Brahmanism, bhakti traditions, buddhism, Jainism, tantra, tribal traditions and folklore, and lastly modernity itself, are the more prominent of these systems. They are responses to previous and surrounding traditions, they invert, subvert and convert their neighbours . . .
Modernity disrupts the whole tradition of reflexivity with new notion of originality and the autonomy of single work. Among other things, the printing press radically altered the relation of audience to author and author to work and it bifurcated the present and past so that the pastness of the past is more keenly felt than the presence of the Past. Reflexive elements may occur in various sizes; one part of the text may reflect on another part; one text may reflect on another; a whole tradition may invert, negate, rework, and revalue another. Where cultures (like the ‘Indian’) are stratified yet interconnected, where the different communities communicate but do not commune, the texts of one stratum tend to reflect on those of another: encompassment, mimicry, criticism and conflict and other power relations are expressed by such reflexivities…

(A. K. Ramanujan in his essay ‘where mirrors are windows’)

रामानुजन ने बृहद् भारतीयता की संगठित होनेवाली समग्रता का बेहद प्रभावशाली चित्र यहाँ खिंचा है। लेकिन बात यह है जिस सांस्कृतिक और भाषाई पृष्ठभूमि से रामानुजन यह कह रहे हैं वह इतने सबकुछ के बाद अधूरी रह जाती है। क्योंकि यहाँ हर बात को शब्द, प्रक्रिया और विचारों के ढांचे में जान लेने का आग्रह है। मनस और वाणी के परे की अनुभूतियों और उनके प्रभावों को तर्क की भाषा में साबित करने के प्रयास है। वहाँ जाकर विश्लेषण अपनी धार खो देता है। पश्चिम में मिस्टिसिज्म शब्द की जो सांस्कृतिक ध्वनि है, उसका शोर महाकाव्यों के स्वरों को प्रभावित कर देता है। उच्चता में अधिक से अधिक आकंठबद्ध करने वाला भाव ही हो पाता है। क्योंकि सोम कोई साइकेडेलिक पदार्थ या संभवत: कोई मशरूम की जाति है। यदि ऐसे पूर्वाग्रह और उन्हें महत्व देने वाली विचारधारा किस प्रकार यथार्थ समग्रता के साथ न्याय कर सकती है।
आधुनिक जीवन में वैश्विक संवाद का जो माध्यम मीडिया और संचार माध्यमों में पनपा है वह बहुत झूठा और उथला है। वह जो दिखता है वह प्रतीतिमात्र है। यथार्थ पोषण जिन तत्चों से होता है वे नितांत आत्मिक है।

गुरुवार को वापस लौटते हुए एक साधुपुरुष मिले। करहधाम के (ग्वालियर मुरैना रोड़ पर) रामदास महाराज जी के साथ के साथ आनन्दमयी माँ, हरि बाबा, उडिया बाबा, प्रभुदत्त ब्रrाचारी, पीताम्बरापीठ के अखण्डश्री महाराज, करपात्री जी महाराज, रणछोडदासजी महाराज, सीताराम ओंकारनाथ आदि महात्माओं के संस्मरण सुना रहे थे। माघ पूर्णिमा से अष्टमी तक करहधाम में वार्षिक कार्यक्रम की चर्चा चली। इस दौरान वहां बड़ा उत्सव होता है और लाखों लोग भंडारे में प्रसाद पाते है। स्थान का नाम करहधाम कड़ाह से बना है। स्थान पर पहले स्वामीजी दूध उबाल कर भक्तों को दिया करते थे और भंडारे के दौरान मालपुए के लिए वहां के 12 फुट व्यास के कड़ाह है। बड़े उत्सव के समय साधु महात्मा उनमें मालपुए बनाते हैं लाखों की तादाद में भक्तों के लिए। उन्होंने अत्यंत प्रेमपूर्वक करहधाम पहुंचने का न्योता भी दिया। मैंने कहा – करहधाम का कार्यक्रम का मीडिया में ठीक ढ़ंग से प्रसार होना चाहिए। कितने लोग हमारी परंपरा को देख पाएंगे और उसके बारे में जान पाएंगे। वे बोले आप मन को बुरा न लगाइएगा लेकिन मीडिया जो करता है वह यथार्थ होता ही नहीं। कोई एक पत्रकार जाने क्या विचार लेकर खबर बनाने पहुंचता है। वह जाने क्या प्रश्न करता है, उसे वहाँ तमाशबीन बने लोग जाने क्या जवाब देते है। वह उसे जाने कैसे प्रस्तुत करता है। आप इससे किस भले की अपेक्षाकर सकते है। जो यथार्थ बात जानता है वह सही बात पकड़ ही लेगा। जो नहीं जानते उन्हें कुछ भी कर यह समझ नहीं दी जा सकती ऐसे माध्यमों से तो बिल्कुल नहीं।
उन साधुपुरुष ने महाराजजी का एक संस्मरण सुनाया। एक बार करहधाम पर एक बड़ा धार्मिक आयोजन था। संतों की बड़ी जमातें और भक्तों का समागम था। किसी अखबार के पत्रकार ने खबर छाप दी 700 मन के पोहे, . . . मन की पूरियां,. . . के मालपुए बनाए जाएंगे। सुबह खबर महाराजजी के पास पहुंची। उन्होंने पत्रकार को बुलाकर पूछा – आपने यहां कि खबर बनाई लेकिन यह बनाने को आपने किसने कहा। उसने किसी व्यक्ति का नाम बताया। महाराजजी ने पूछा- आपने यहां किसी से लिखी बातों की तस्दीक की। उसने जवाब दिया – नहीं। वहां खड़े भक्तों ने उसे ठीकठाक जानकारी दी और अगले दिन उसने त्रुटिसुधार करते हुए खबर लिखी।
वे सज्जन हंसते हुए बोले – क्या समझे?

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