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Archive for दिसम्बर, 2011

:: श्री ::

गरजते गिरते उठते
साँझ में श्यामल बादल घने
धरा पर लौटने को आतुर
मरुतों पर सवार अनमने
जूही चमेली को लहकाते
इन्द्रधनुष लाँघ घेरते आसमान
वन अशोक के दमकते भोगों में
जानकी के शोकांकित नैन घने
ताल से जब झाँकते कमल-नयन
श्वास के साथ उठते उर्मिल प्राण
जल बिन्दुओं पर झिलमिल मित्र में
सहस्रपुरुष विभु नयनाभिराम
आर्य कुमार को सर्वत्र देख
नेत्रों से अश्रु अर्घ्य दिया
प्रिय प्राणों को प्राणप्रिय में मिला
सीता ने संध्यावंदन पूर्ण किया

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श्रावण में जब मेघ गरजता है
धरती के भीतर
पेड़ों की शाखाओं में
सागर उमड़ता है
आकाश से उतर
जल मन हो जाता है
चित्रकूट में राम के नैनों से निर्झर
अशोक वन को शोक प्लावित करता है
पवन सा उन्मत्त
कभी दिव्य आदित्य प्रदीप्त
शिला सम स्थिर
या स्वरस में मौन हो जाता हूँ
फिर तो मैं कुछ नहीं होता
जल वायु तेज गुरुत्व और अवकाश
तत्त्व ही मैं बनता हूँ
कहो आदिकवि!
तब क्या मैं ही तमसा तट, क्रौंच और वाल्मीकि होता हूँ
मन्दाकिनी शृंगारित गिरी कामद राम होता हूँ?

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आश्विन की धुंध

आश्विन में पहली बार
सुबह जब धुंध छाई
मानो प्रकृति सकुचाई
विराट पुरुष के अंक में समाई,
आसमानी नदी के तल पर
पारिजात ने तारे बिछाये
कास के फूल हिले हौले से
सिक्त कदम्ब पल्लव ने ली अंगड़ाई
क्यों मैं स्तब्ध नारियल सा
धुंध की झील में निरपेक्ष खड़ा
जब सुबह धुंध छाई
आश्विन में पहली बार

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