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Archive for अप्रैल, 2012

प्रिय मैं तुम्हारे उच्छ्वास हूँ

रोम – रोम में क्षण – प्रतिक्षण

जो भाव वर्तुल उठते हैं

अंतर्यामी ! सब तुम्हें ही खोजते हैं .

तुम मेरे श्वास हो प्रिय

जब तुम्हारे चरण चित्त में उतरते हैं

ह्रदयकमल में भ्रमरपंख छूकर घन

राग आल्हाद छेड़ते हैं .

श्वास-उच्छ्वास की तरंगों पर खेलती

प्राणों की नौका ही जीवन हैं

कभी तुम मैं बन देखो तो जानोगे, राम

असीम का आस्वादन कैसे होता है ?

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