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Archive for जुलाई, 2012

रात में जो अव्यक्त होता है
प्रातः दृष्टि किरण सृष्टि बन
दर्शन तुम्हारा सविता
हर नेत्र में अहंता बन व्यक्त होता है.
तुम्हारे प्रेम निर्झर में प्रिय
तुम ही व्यक्त होते हो
दृश्य, दृष्टा, दृश्यमान एकाकार
तुम्हारा प्रत्यक्ष होता है.

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